International Mother Language Day: जानिए यह दिन क्यों मनाया जाता है?

क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस? जानिए महत्व! | International Mother Language Day, 21 February

International Mother Language Day, 21 February: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हर साल 21 फरवरी को मनाया जाता है। यह एक वैश्विक आयोजन है जो भाषाओं की विविधता और सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इस ब्लॉग में हम इस दिवस की पृष्ठभूमि, इतिहास, महत्व और वर्तमान परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा करेंगे। हम देखेंगे कि भाषाएं क्यों महत्वपूर्ण हैं और कैसे हम उन्हें संरक्षित कर सकते हैं। यह ब्लॉग सरल भाषा में लिखा गया है ताकि हर कोई आसानी से समझ सके।

this is the image of , UNESCO Mother Language Day

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का परिचय

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाने वाला एक विश्वव्यापी वार्षिक आयोजन है। इसका मुख्य उद्देश्य भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाना और बहुभाषावाद को बढ़ावा देना है। यूनेस्को द्वारा 17 नवंबर 1999 को पहली बार इसकी घोषणा की गई थी। बाद में, 2002 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संयुक्त राष्ट्र संकल्प 56/262 को अपनाने के साथ इसे औपचारिक मान्यता मिली।

यह दिवस संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 16 मई 2007 को अपनाए गए संकल्प 61/266 का हिस्सा है, जो “विश्व के लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली सभी भाषाओं के संरक्षण और सुरक्षा को बढ़ावा देने” की व्यापक पहल है। इस संकल्प ने 2008 को अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष के रूप में भी स्थापित किया। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का विचार बांग्लादेश की पहल थी। बांग्लादेश में 21 फरवरी 1952 की घटना की याद में यह दिवस चुना गया, जब बंगालियों ने अपनी बंगाली भाषा को मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष किया था।

यह दिवस न केवल बांग्लादेश में, बल्कि भारत के पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड और त्रिपुरा राज्यों तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रहने वाले भारतीय बंगालियों द्वारा भी मनाया जाता है। यह वैश्विक स्तर पर भाषाओं की रक्षा और विविधता को प्रोत्साहित करता है।

भाषा क्यों महत्वपूर्ण है?

किसी व्यक्ति की मातृभाषा वह पहली भाषा होती है जिसे वह सीखता है। कई लोगों के लिए, यह उनके घर, पहचान और संस्कृति से सबसे मजबूत जुड़ाव का माध्यम है। दुर्भाग्यवश, वैश्वीकरण के कारण कई भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि हर दो सप्ताह में एक मातृभाषा लुप्त हो जाती है, और इसके साथ ही एक पूरी सांस्कृतिक विरासत भी मिट जाती है। एक संस्कृति की सभी कहानियां और मौखिक परंपराएं खो जाती हैं।

वर्तमान में, स्कूलों में केवल कुछ सौ भाषाएं ही पढ़ाई जाती हैं और सार्वजनिक क्षेत्र में इनका उपयोग होता है। इंटरनेट पर तो और भी कम भाषाएं प्रचलित हैं, जबकि हममें से अधिकांश लोग इसका दैनिक उपयोग करते हैं। इसका प्रभाव उन भाषाओं पर पड़ता है जो प्रासंगिक बनी रहती हैं। दुनिया में बोली जाने वाली अनुमानित 6000 भाषाओं में से 43% लुप्तप्राय हैं। इन्हें बेकार मानकर अधिक प्रचलित भाषाओं को अपनाया जा रहा है। माता-पिता और शिक्षक इन्हें बच्चों को नहीं सिखाते, जिससे ये भाषाएं अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंच पातीं और विलुप्त हो जाती हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में कभी बोली जाने वाली भाषाओं की समृद्ध विविधता अब कम होती जा रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी मातृभाषाओं के लुप्त होने से अंग्रेजी हावी हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विभिन्न भाषाओं और मातृभाषाओं के शिक्षण को बढ़ावा देता है, ताकि विविधता को प्रोत्साहित किया जा सके और विभिन्न संस्कृतियों के इतिहास को संरक्षित किया जा सके। परिणामस्वरूप, हम दुनिया भर की विभिन्न परंपराओं के बारे में सीखते हैं, जो हमें विभिन्न लोगों, देशों और संस्कृतियों के प्रति अधिक सहिष्णु और समझदार बनाती हैं।

  • भाषाओं के लुप्त होने के कारण: वैश्वीकरण, शहरीकरण और प्रमुख भाषाओं का प्रभुत्व।
  • प्रभाव: सांस्कृतिक विरासत का नुकसान, पहचान की हानि।
  • समाधान: मातृभाषा में शिक्षा, जागरूकता अभियान।

पृष्ठभूमि

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा यूनेस्को के महासभा सम्मेलन द्वारा नवंबर 1999 में की गई थी। यह विचार बांग्लादेश की पहल था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2002 के अपने प्रस्ताव में इस दिवस का स्वागत किया। 16 मई 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव A/RES/61/266 में सदस्य देशों से सभी भाषाओं के संरक्षण का आह्वान किया। इसी प्रस्ताव से 2008 को अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित किया गया, जिसका उद्देश्य बहुभाषावाद और बहुसंस्कृतिवाद के माध्यम से विविधता में एकता और अंतर्राष्ट्रीय समझ को बढ़ावा देना था। यूनेस्को को इस वर्ष की अग्रणी एजेंसी के रूप में मान्यता दी गई।

आज भाषाओं की भूमिका विकास, सांस्कृतिक विविधता, अंतरसांस्कृतिक संवाद, सहयोग, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समावेशी ज्ञान समाजों के निर्माण, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और सतत विकास में महत्वपूर्ण है। भाषाएं मूर्त और अमूर्त विरासत को संरक्षित करती हैं। मातृभाषाओं के प्रसार से भाषाई विविधता, बहुभाषी शिक्षा, जागरूकता, समझ, सहिष्णुता और संवाद बढ़ता है।

इतिहास

21 फरवरी को यूनेस्को द्वारा 17 नवंबर 1999 को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया गया। इसे 21 फरवरी 2000 से विश्व भर में मनाया जाता है। यह बांग्लादेश के भाषा आंदोलन को श्रद्धांजलि है। 1947 में पाकिस्तान का गठन हुआ, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान (अब पाकिस्तान) थे। ये दोनों भाग संस्कृति और भाषा में अलग थे।

1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को एकमात्र राष्ट्रीय भाषा घोषित किया, जबकि पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली बोली जाती थी। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने विरोध किया और बंगाली को राष्ट्रीय भाषा बनाने की मांग की। यह मांग धीरेन्द्रनाथ दत्ता ने 23 फरवरी 1948 को उठाई। सरकार ने सभाओं पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने रैलियां कीं। 21 फरवरी 1952 को पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें अब्दस सलाम, अबुल बरकत, रफीक उद्दीन अहमद, अब्दुल जब्बार और शफीउर रहमान मारे गए। सैकड़ों घायल हुए। यह अपनी मातृभाषा के लिए प्राण बलिदान का दुर्लभ उदाहरण है।

तब से बांग्लादेश में 21 फरवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है। लोग शहीद मीनार जाते हैं। यह दिवस बांग्लादेश में राष्ट्रीय अवकाश है। प्रस्ताव रफीकुल इस्लाम और अब्दुस सलाम ने रखा। उन्होंने 9 जनवरी 1998 को कोफी अन्नान को पत्र लिखा। रफीकुल ने 21 फरवरी प्रस्तावित किया। प्रस्ताव बांग्लादेश की संसद में पेश हुआ और यूनेस्को को भेजा गया। सैयद मुअज़्ज़म अली और तोज़म्मेल टोनी हक ने इसे आगे बढ़ाया। 17 नवंबर 1999 को यूनेस्को की 30वीं महासभा ने इसे अपनाया।

यूनेस्को की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली। 2008 में अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष ने इसके महत्व को बढ़ाया। इस दिवस की नींव 1952 के भाषा आंदोलन से जुड़ी है। 21 फरवरी 1952 को छात्रों पर गोली चली, कई मारे गए। बांग्लादेश में राष्ट्रीय अवकाश। यूनेस्को ने 1999 में मान्यता दी; 2000 में पहली बार मनाया गया। 2025 में 25वीं वर्षगांठ है।

  • मुख्य घटनाएं:
    • 1952: बंगाली भाषा आंदोलन।
    • 1955: बांग्लादेश में पहली बार भाषा आंदोलन दिवस।
    • 1999: यूनेस्को की घोषणा।
    • 2000: उद्घाटन समारोह।

आधुनिक परिदृश्य

भारतीय संविधान निर्माताओं की आकांक्षा थी कि शासन अपनी भाषाओं में चले। भारत प्रगति कर रहा है, लेकिन लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच रहा है। कारण: शासन जनता की भाषा में नहीं। अंग्रेजी का प्रभाव है, लेकिन हिंदी पीछे नहीं। हिंदी बोलचाल से इंटरनेट तक इस्तेमाल होती है। अपेक्षा: सरकारी कार्यालयों में हिंदी प्रयोग।

2026 का विषय: बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की राय। भाषाई परिदृश्य बदल रहा है। प्रवासन, तकनीकी विकास और बहुभाषावाद के लाभ। युवा भाषाओं की रक्षा में भूमिका निभाते हैं। चुनौतियां: 40% शिक्षार्थी अपनी भाषा में शिक्षा नहीं पाते। स्वदेशी, प्रवासी और अल्पसंख्यक प्रभावित। समावेशी नीतियां जरूरी।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस समावेश और सतत विकास लक्ष्यों में भाषाओं की भूमिका रेखांकित करता है। बहुभाषी शिक्षा समावेशी समाज बनाती है और गैर-प्रमुख भाषाओं का संरक्षण करती है।

मातृभाषा

मातृभाषा संस्कारों की संवाहक है। बिना इसके संस्कृति की कल्पना नहीं। यह राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देशप्रेम उत्प्रेरित करती है। मातृभाषा आत्मा की आवाज है और देश को एकजुट करती है। मां के आंचल में पल्लवित भाषा बालक के विकास को शब्द देती है। प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए।

विश्वभर में भाषाओं की स्थिति

यूनेस्को के अनुसार, दुनिया में 8,324 भाषाएं हैं, जिनमें 7,000 प्रचलन में। कई विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह दिवस उनके संरक्षण में भूमिका निभाता है।

  • तथ्य: 43% भाषाएं लुप्तप्राय।
  • कारण: वैश्वीकरण, प्रमुख भाषाओं का दबाव।
  • प्रभाव: सांस्कृतिक हानि।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का महत्व

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने वाला एक वैश्विक दिवस है। यह मातृभाषाओं के संरक्षण, बहुभाषावाद और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा पर जोर देता है। नीचे इसके प्रमुख महत्व को बिंदुओं में समझें:

  • भाषाई विविधता का संरक्षण: दुनिया में लगभग 8,000 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन कई विलुप्त होने के कगार पर हैं। हर दो सप्ताह में एक भाषा गायब हो जाती है। यह दिवस लुप्तप्राय भाषाओं को बचाने और उनकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की जागरूकता फैलाता है।
  • बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहन: मातृभाषा में शिक्षा बेहतर समझ, सीखने और संज्ञानात्मक विकास में मदद करती है। यह दिवस बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देता है, जिससे समावेशी समाज बनता है और अल्पसंख्यक/स्वदेशी भाषाओं को मजबूती मिलती है।
  • सांस्कृतिक पहचान और विरासत की रक्षा: मातृभाषा व्यक्ति की पहचान, संस्कृति, परंपराओं और इतिहास से जुड़ी होती है। यह दिवस भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देता है और सहिष्णुता, समझ तथा अंतरसांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देता है।
  • भाषाई अधिकारों की सुरक्षा: यह दिवस स्वदेशी, अल्पसंख्यक और प्रवासी समुदायों के भाषाई अधिकारों की रक्षा पर जोर देता है। 1952 के बांग्लादेश भाषा आंदोलन की याद में यह दिवस भाषा के लिए बलिदान की भावना को जीवित रखता है।
  • सतत विकास लक्ष्यों में योगदान: भाषाएं शिक्षा, सामाजिक समावेशन, आर्थिक विकास और शांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में भाषाओं की भूमिका को रेखांकित करता है।
  • जागरूकता और वैश्विक एकता: 1999 में यूनेस्को द्वारा घोषित और 2000 से मनाया जाने वाला यह दिवस (2025 में 25वीं वर्षगांठ) विविधता में एकता को प्रोत्साहित करता है। यह लोगों को विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के प्रति सम्मान सिखाता है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के पीछे की प्रेरणा

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) की मुख्य प्रेरणा बांग्लादेश के भाषा आंदोलन से आई है। यह दिवस भाषाई विविधता, बहुभाषावाद और मातृभाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। नीचे प्रमुख बिंदु दिए गए हैं:

  • 1952 का बंगाली भाषा आंदोलन: 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में अधिकांश लोग बंगाली बोलते थे। लेकिन 1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को एकमात्र राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया। इससे बंगालियों में असंतोष फैला और उन्होंने बंगाली को भी आधिकारिक भाषा बनाने की मांग की।
  • 21 फरवरी 1952 की घटना: ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रदर्शन किया। सरकार ने सभाओं पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन छात्रों ने विरोध जारी रखा। पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें अब्दुस सलाम, अबुल बरकत, रफीक उद्दीन अहमद, अब्दुल जब्बार और शफीउर रहमान जैसे छात्र शहीद हो गए। सैकड़ों घायल हुए। यह इतिहास में दुर्लभ उदाहरण है जहां लोग अपनी मातृभाषा के लिए प्राण न्योछावर कर गए।
  • शहीदों की स्मृति: इस घटना ने बांग्लादेश में गहरा प्रभाव छोड़ा। लोग शहीद मीनार जाते हैं और इसे दुखद दिन के रूप में याद करते हैं। यह आंदोलन बाद में बांग्लादेश की स्वतंत्रता (1971) की नींव बना।
  • अंतर्राष्ट्रीय पहल: 1998 में वैंकूवर (कनाडा) में रहने वाले बंगाली रफीकुल इस्लाम और अब्दुस सलाम ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान को पत्र लिखा। उन्होंने 21 फरवरी को चुनकर विश्व की भाषाओं को विलुप्त होने से बचाने का आग्रह किया। बांग्लादेश सरकार ने यूनेस्को को प्रस्ताव दिया।
  • यूनेस्को की घोषणा: 17 नवंबर 1999 को यूनेस्को की 30वीं महासभा ने सर्वसम्मति से 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया। 2000 से इसे विश्व स्तर पर मनाया जाता है। 2002 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे मान्यता दी।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस तिथियों के अनुसार महत्वपूर्ण तथ्य

  • 1952: बंगाली भाषा आंदोलन।
  • 1955: बांग्लादेश में पहली बार मनाया।
  • 1999: यूनेस्को घोषणा।
  • 2000: उद्घाटन।
  • 2002: भाषाई विविधता, 3,000 लुप्तप्राय भाषाएं।
  • 2004: बच्चों की शिक्षा।
  • 2005: ब्रेल और सांकेतिक भाषाएं।
  • 2006: भाषाएं और साइबरस्पेस।
  • 2007: बहुभाषी शिक्षा।
  • 2008: अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष।
  • 2010: संस्कृतियों का मेल।
  • 2012: मातृभाषा में शिक्षण।
  • 2013: मातृभाषा शिक्षा के लिए पुस्तकें।
  • 2014: स्थानीय भाषाएं विज्ञान के लिए।
  • 2015: समावेशन: भाषा मायने रखती है।
  • 2016: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और भाषा।
  • 2017: सतत भविष्य के लिए बहुभाषी शिक्षा।
  • 2018: हमारी भाषाएं, हमारी धरोहर।
  • 2019: स्वदेशी भाषाओं का वर्ष।
  • 2020: विविधता की सुरक्षा।
  • 2021: बहुभाषावाद को बढ़ावा।
  • 2022: प्रौद्योगिकी का उपयोग।
  • 2023: बहुभाषी शिक्षा की आवश्यकता।
  • 2024: बहुभाषी शिक्षा अधिगम का स्तंभ।
  • 2025: रजत जयंती।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस कैसे मनाएं?

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (21 फरवरी) को मनाने के कई सरल और प्रभावी तरीके हैं। यह दिन भाषाई विविधता, बहुभाषावाद और मातृभाषा के संरक्षण को बढ़ावा देता है। यहां कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं:

  • एक नई भाषा सीखने की शुरुआत करें — किसी नए शब्द, वाक्यांश या ग्रीटिंग (जैसे “हैलो” या “नमस्ते”) सीखें। ऐप्स या ऑनलाइन कोर्स का उपयोग करें, ताकि बहुभाषावाद को प्रोत्साहन मिले।
  • अपनी मातृभाषा में बातचीत या लेखन करें — पूरे दिन अपनी मातृभाषा में बात करें, डायरी लिखें या घरवालों से कहानियां सुनें। इससे भाषा जीवंत रहती है।
  • सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाएं — अपनी मातृभाषा में पोस्ट शेयर करें, मुहावरे, कविता या रोचक तथ्य डालें। हैशटैग जैसे #InternationalMotherLanguageDay या #मातृभाषादिवस इस्तेमाल करें।
  • बहुभाषी ग्रीटिंग्स सिखाएं और साझा करें — परिवार, दोस्तों या क्लास में विभिन्न भाषाओं में “नमस्ते”, “हैलो”, “बोनजोर” आदि सिखाएं। स्कूलों में मॉर्निंग असेंबली में यह मजेदार गतिविधि हो सकती है।
  • बहुभाषी किताबें पढ़ें या सुनें — अपनी या अन्य भाषाओं की किताबें, कहानियां या गाने सुनें। बच्चों के साथ बाइलिंगुअल बुक्स पढ़ें, ताकि विविधता का एहसास हो।
  • भाषा-थीम वाली पार्टी या कार्यक्रम आयोजित करें — घर या स्कूल में विभिन्न भाषाओं के लोगों को आमंत्रित करें। हर कोई अपनी भाषा में स्वागत, गीत या कहानी साझा करे।
  • लुप्तप्राय भाषाओं के बारे में जानें — यूनेस्को की वेबसाइट पर खतरे में पड़ी भाषाओं के बारे में पढ़ें और उन्हें बचाने के प्रयासों में योगदान दें।
  • फिल्म या डॉक्यूमेंट्री देखें — मातृभाषा फिल्म फेस्टिवल जैसी घटनाओं में शामिल हों या ऑनलाइन भाषाई विविधता पर फिल्में देखें।
  • स्कूल/कॉलेज में प्रदर्शनी या क्विज आयोजित करें — विभिन्न भाषाओं के पोस्टर, अल्फाबेट या क्विज़ बनाएं। इससे जागरूकता बढ़ती है।
  • युवा आवाजों को बढ़ावा दें — 2026 की थीम “बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की राय” के अनुरूप चर्चा करें या ऑनलाइन इवेंट में भाग लें।

स्वदेशी भाषाओं की रक्षा के लिए भारत की पहल

भारत में स्वदेशी भाषाओं की रक्षा के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं, जो लुप्तप्राय भाषाओं, जनजातीय बोलियों और मातृभाषाओं के संरक्षण पर केंद्रित हैं। ये प्रयास शिक्षा, दस्तावेजीकरण, डिजिटल प्रौद्योगिकी और नीतिगत स्तर पर चल रहे हैं। मुख्य पहलें निम्नलिखित हैं:

  • लुप्तप्राय भाषाओं की सुरक्षा और संरक्षण योजना (SPPEL): शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2013 में शुरू की गई। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL), मैसूर द्वारा संचालित। 10,000 से कम बोलने वालों वाली 117 लुप्तप्राय भाषाओं का दस्तावेजीकरण, व्याकरण, द्विभाषी/त्रिभाषी शब्दकोश, चित्रात्मक शब्दावली और ऑडियो-वीडियो संग्रह तैयार किया जा रहा है। भविष्य में 500 से अधिक भाषाओं को कवर करने का लक्ष्य।
  • नई शिक्षा नीति (NEP) 2020: मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा (कम से कम कक्षा 5 तक) पर जोर। बहुभाषी शिक्षा (MLE) को बढ़ावा, जिससे स्वदेशी भाषाओं में प्राइमर और शिक्षण सामग्री विकसित की जा रही है। UNESCO की 2025 रिपोर्ट “Bhasha Matters” भी MTB-MLE को समर्थन देती है।
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय की पहलें: जनजातीय भाषाओं में द्विभाषी शब्दकोश, प्राइमर (कक्षा 1-3), बहुभाषी शिक्षा हस्तक्षेप, सम्मेलन, कार्यशालाएं और काव्य संगोष्ठियां। AI-आधारित संरक्षण परियोजनाएं भी चल रही हैं।
  • केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) की भूमिका: सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन। डिजिटल डिक्शनरी, ऑनलाइन रिपॉजिटरी और भाषा दस्तावेजीकरण। Bharatavani प्लेटफॉर्म पर 77 जनजातीय भाषाओं के संसाधन उपलब्ध।
  • UGC की योजनाएं: राज्य विश्वविद्यालयों को लुप्तप्राय भाषाओं के अध्ययन/अनुसंधान के लिए फंडिंग। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लुप्तप्राय भाषा केंद्र स्थापित।
  • डिजिटल और AI पहलें: भाषिणी (राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन), भारतजेन AI (22 आधिकारिक भाषाओं में), आदि-वाणी (जनजातीय भाषाओं के लिए)। डिजिटल सामग्री से भाषाओं को जीवंत रखना।
  • राज्य-स्तरीय प्रयास: ओडिशा का “अमा घर” (आदिवासी बच्चों के लिए), केरल का “नमथ बसई” (स्थानीय भाषाओं में शिक्षा)।

निष्कर्ष: International Mother Language Day, 21 February

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हमें याद दिलाता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति, इतिहास और भावनाओं का जीवंत रूप है। 21 फरवरी 1952 के बांग्लादेश भाषा आंदोलन के शहीदों के बलिदान से प्रेरित यह दिवस आज पूरी दुनिया को भाषाई विविधता के संरक्षण, बहुभाषावाद के प्रचार और मातृभाषा में शिक्षा के महत्व का संदेश देता है।

जब वैश्वीकरण और प्रमुख भाषाओं के दबाव में हजारों भाषाएं लुप्त होने की कगार पर हैं, तब यह दिवस हमें जागरूक करता है कि प्रत्येक भाषा एक अनमोल धरोहर है। आइए, हम अपनी मातृभाषा को जीवित रखें, नई पीढ़ी को सिखाएं और विभिन्न भाषाओं के प्रति सम्मान बढ़ाएं। क्योंकि विविधता में ही सच्ची एकता और मानवता का विकास संभव है।

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