ओशो की जीवनी: एक आध्यात्मिक क्रांतिकारी का सफर – एक रहस्य, एक विद्रोह, एक क्रांति! | Osho Rajneesh | Osho Death | Osho biography | Biography of Osho
ओशो आधुनिक युग के उन विरले आध्यात्मिक गुरुओं में से हैं जिन्होंने न केवल भारत में, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में आध्यात्मिकता, स्वतंत्रता और चेतना की नई परिभाषा रची। उनका जीवन एक अद्भुत यात्रा था—बचपन की सरल जिज्ञासाओं से लेकर युवा अवस्था के विद्रोही विचारों तक, और अंततः एक ऐसे गुरु बनने तक जिसने लाखों लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। उनके विचार, उनकी शिक्षाएं और उनका अद्वितीय व्यक्तित्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके जीवनकाल में था। Biography of Osho. केवल किसी आध्यात्मिक नेता की कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक स्वतंत्रता की खोज का अभूतपूर्व दस्तावेज़ है। ओशो का जीवन हमें यह समझने में मदद करता है कि सच्ची आध्यात्मिकता परंपराओं को तोड़कर, सत्य को स्वयं अनुभूत करके और जीवन को पूर्णता से जीकर ही संभव है। उनका अस्तित्व आज भी दुनिया के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
Biography of Osho: प्रस्तावना
भारत की आध्यात्मिक विरासत में अनेक संत, दार्शनिक और आध्यात्मिक क्रांतिकारी हुए, परंतु ओशो — जिनका मूल नाम चन्द्रमोहन जैन था — उन सभी से पूर्णत: भिन्न धारा के व्यक्ति थे। वे विचारों को परंपरा से नहीं, अनुभव से परखते थे। वे सिद्धांतों की बजाय जीवन की धड़कन को सुनते थे। उन्हें दुनिया ने कई नामों से जाना — आचार्य रजनीश, भगवान श्री रजनीश और अंततः “ओशो” — एक ऐसा नाम जो शांति, व्यापकता और तरंगित अस्तित्व की अनुभूति कराता है।
20वीं शताब्दी में ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हुआ जिसने आध्यात्मिकता को इतने व्यापक, तेज़, विवादास्पद, मुक्त और जीवंत रूप में दुनिया के सामने रखा हो। उनकी शिक्षाएँ ध्यान, प्रेम, स्वतंत्रता, आनंद, शरीर-मन की एकता, धर्मों की सीमाओं से पार मानव चेतना और अंतर्मन की विकास-यात्रा पर आधारित थीं। उनके शब्दों में गहरा तर्क था, पर साथ ही काव्य की तरह कोमलता भी। वे कहते थे — “मैं किसी धर्म का प्रचारक नहीं, बल्कि विध्वंसक हूँ — झूठे धर्मों का विध्वंसक, ताकि मनुष्य अपने वास्तविक केंद्र को पा सके।”
उनका जीवन मात्र एक अध्यात्मिक गुरु का जीवन नहीं था, बल्कि संघर्ष, प्रेम, विवाद, राजनीति, सार्वभौमिक ध्यान तकनीकों, वैश्विक समुदायों, निर्वासन, मौन और अंत में एक शांतिपूर्ण, दिव्य उपस्थिति की महान यात्रा था। यह जीवनी उनके जीवन को सतही रूप से नहीं, बल्कि उस गहराई में झाँकते हुए प्रस्तुत करती है जहाँ ओशो के शब्द, अनुभव, पीड़ा, उत्सव और मौन एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।
जीवन: बचपन एवं किशोरावस्था
ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाडा नामक छोटे से गांव में हुआ। उनका परिवार कपड़ा व्यापार से जुड़ा था — एक सामान्य, सामाजिक और संस्कारिक जैन परिवार। परंतु बचपन से ही चन्द्रमोहन साधारण नहीं थे। वे असाधारण रूप से स्वतंत्र थे, गहराई से जिज्ञासु, और जीवन के किसी भी नियम को केवल इसलिए स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि “सब मानते हैं।”
उनके जीवन के शुरुआती सात वर्ष उन्होंने अपने ननिहाल में बिताए — और ओशो स्वयं कहते थे कि यह अवधि उनके व्यक्तित्व की नींव है। उनकी नानी उन्हें किसी भी धार्मिक बंधन, नियम या नैतिक दबाव में नहीं रखती थीं। वह पूर्ण स्वतंत्रता के साथ बढ़े — जंगलों में घूमना, नदियों में तैरना, मृत्यु को देखना, जीवन को देखना, पक्षियों का जन्म, पशुओं का संघर्ष — उन्होंने जीवन को किताबों से नहीं, प्रकृति से पढ़ा।
वे कहते थे कि यह स्वतंत्रता ही बाद में उनकी आध्यात्मिक क्रांति की मूल ऊर्जा बनी।
किशोरावस्था में उनका स्वभाव और भी तीखा हो गया। वे प्रश्न पूछते थे — ऐसे प्रश्न जिनसे बुज़ुर्ग परेशान हो जाते थे। वे पंडितों से बहस करते, पुजारियों को चुनौती देते और प्रश्न उठाते कि “क्या ईश्वर पुस्तक में है, या जीवन में?” उनके माता-पिता अक्सर उनके रवैये से चिंतित हो जाते, परंतु जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि यह लड़का एक सामान्य धार्मिक अनुयायी नहीं, बल्कि जन्मजात खोजी है।
16 वर्ष की आयु में उनकी गहन मृत्यु-बोध संबंधी घटना हुई जिसमें उन्होंने अपनी प्रेमिका के निधन को अत्यंत निकट से अनुभव किया। उन्होंने कहा कि इस घटना ने उन्हें जीवन के प्रति निर्मम लेकिन गहन अंतर्दृष्टि प्रदान की — “मृत्यु ही जीवन के भीतर छिपा द्वार है।”
किशोरावस्था तक आते-आते वे अज्ञेयवादी, नास्तिक, तर्कवादी और विद्रोही हो चुके थे — और यही व्यक्तित्व आगे चलकर “ओशो” बनने की राह बना।
जीवनकाल (शिक्षा, प्रारंभिक करियर और आध्यात्मिक विकास)
शिक्षा के क्षेत्र में ओशो अत्यंत मेधावी थे। उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातक और फिर स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों से उत्तीर्ण की। उनकी प्रतिभा इतनी अधिक थी कि विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पद हेतु उन्हें बिना संघर्ष स्वीकार किया गया। वे जबलपुर विश्वविद्यालय में अध्यापक बने और जल्द ही प्रसिद्ध — और बदनाम — हो गए।
कक्षाओं में वे विद्यार्थियों को केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं बताते थे; वे प्रश्न पूछते, तर्क कराते और हर सिद्धांत को Practical रूप से परखने को प्रेरित करते। उनकी कक्षाएँ जीवंत, उत्तेजक, बौद्धिक रूप से तीव्र और क्रांतिकारी होती थीं।
इसी समय उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों में प्रवचना देना शुरू किया। ये प्रवचन दो धाराओं पर चलते थे:
- गांधीवाद, समाजवाद और पारंपरिक धर्म की तीखी आलोचना
- मानव चेतना, प्रेम, स्वतंत्रता और ध्यान पर अत्यंत प्रखर विचार
उनकी आलोचना इतनी साहसिक और खुली थी कि वे राजनीतिक दलों, धार्मिक संगठनों और कई सामाजिक संस्थाओं के निशाने पर आ गए। लेकिन जैसे-जैसे विरोध बढ़ा, उनकी लोकप्रियता और शिष्यों का दायरा भी बढ़ता गया। 1960–70 के दशक में वे भारत के सबसे चर्चित दार्शनिकों में शामिल हो चुके थे।
ओशो की शिक्षा: आध्यात्मिकता की नई भाषा
ओशो के विचारों को किसी एक धर्म, परंपरा या पद्धति में बाँधा नहीं जा सकता। वे कहते थे:
“मैं किसी ism का सिद्धांतकार नहीं; मैं जीवन की ऊर्जा का प्रवक्ता हूँ।”
उनकी शिक्षाओं के मूल तत्व थे:
- ध्यान (Meditation): उनका मानना था कि ध्यान जीवन का केंद्र है। उन्होंने 100 से अधिक ध्यान विधियाँ विकसित कीं। उनकी प्रसिद्ध तकनीक — डायनेमिक मेडिटेशन — आधुनिक मनुष्य के लिए विशेष रूप से बनाई गई थी।
- प्रेम और स्वतंत्रता: ओशो कहते थे कि प्रेम और स्वतंत्रता साथ चलते हैं; जहाँ स्वतंत्रता नहीं, वहाँ प्रेम पिंजरा बन जाता है।
- देह और मन की एकता: वे शरीर को दबाने के विरोधी थे। उनका कहना था कि शरीर आध्यात्मिकता का मंदिर है, बाधा नहीं।
- धर्मों की आलोचना: वे किसी धर्म को नहीं मानते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि धर्म मनुष्य को बाँधता है। लेकिन वे आध्यात्मिकता के प्रबल समर्थक थे।
- वर्तमान का दर्शन: उनके शब्दों में — “मनुष्य का असली घर वर्तमान है; अतीत और भविष्य केवल भ्रम हैं।”
- मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता का मेल: उन्होंने पश्चिमी मनोविज्ञान, ज़ेन, ताओ, सूफ़ीवाद, बौद्ध धर्म तथा उपनिषदों को एक साथ जोड़कर आधुनिक मनुष्य के लिए एक नया मार्ग तैयार किया। उनकी शिक्षाएँ अत्यंत गहरी, तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक और अनुभव-आधारित थीं।
ओशो का ज्ञानोदय अनुभव
ओशो (रजनीश) ने अपने ज्ञानोदय (Enlightenment) के अनुभव को कई प्रवचनों में विस्तार से और सजीव तरीके से वर्णित किया है। यह अनुभव 21 वर्ष की आयु में हुआ था। नीचे इसे बिंदुवार रूप में सरल भाषा में समझाया गया है, जिसमें मूल भाव और ओशो के अपने शब्दों के सार को बनाए रखा गया है:
- उम्र और समय: ओशो 21 वर्ष के थे जब यह घटना घटी। यह उनके जीवन का सबसे निर्णायक और परिवर्तनकारी क्षण था। उन्होंने इसे “ज्ञानोदय” कहा, लेकिन बार-बार जोर दिया कि यह कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि भीतर की एक क्रांति थी।
- सात दिनों की मृत्यु जैसी स्थिति: लगातार सात दिनों तक उन्हें ऐसा अनुभव हुआ जैसे वे मर रहे हैं। हर पल मृत्यु निकट आ रही थी। शरीर, मन और अहंकार सब मरने की प्रक्रिया में थे। यह एक भीषण और निरंतर मृत्यु-भाव था।
- पूर्ण मृत्यु का एहसास: सातवें दिन जब उन्हें लगा कि मृत्यु अब पूर्ण हो गई है, तब सब कुछ गायब हो गया। आखिरी बाधा भी मिट गई। भीतर कोई “मैं” नहीं बचा — न कोई अहंकार, न कोई साक्षी, न कोई दर्शक। सब शांत और स्थिर हो गया।
- परमानंद और प्रकाश का उदय: मृत्यु के पूर्ण होने के तुरंत बाद एक महान आनंद (परमानंद) उभरा। शुरू में यह एक छोटी सी रोशनी या लौ जैसा था, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई और अंत में एक विशाल, जीवंत, दीप्तिमान और शाश्वत अग्नि बन गई। यह आनंद असीम और अखंड था।
- मन का लुप्त होना: ज्ञानोदय के बाद उनका मन पूरी तरह लुप्त हो गया। केवल शुद्ध चेतना (pure consciousness) शेष रह गई। विचार, इच्छाएं और अतीत सब गायब हो गए। उन्होंने कहा कि अब केवल “होना” (being) रह गया था।
- हँसी का पहला प्रतिक्रिया: ज्ञानोदय होते ही ओशो जोर-जोर से हँस पड़े। यह एक उन्मुक्त, जोरदार हँसी थी। वे हँसे क्योंकि उन्हें सारी कोशिशों की बेवकूफी दिख गई — enlightenment पाने की सारी मेहनत व्यर्थ थी, क्योंकि यह प्रयास से नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और विश्राम से होता है।
- कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा का अंत: ज्ञानोदय के बाद उन्हें एहसास हुआ कि कुछ भी प्राप्त करने की, कहीं पहुंचने की या कुछ बनने की कोई जरूरत नहीं है। सब कुछ पहले से ही मौजूद है। “There is nowhere to go, nothing to achieve.”
- एक वर्ष तक की चुनौती: ज्ञानोदय के बाद लगभग एक वर्ष तक शरीर और दैनिक जीवन बनाए रखना बहुत कठिन था। भूख-प्यास गायब हो गई। शरीर इतना असंवेदनशील हो गया कि उन्हें खुद को चोट पहुंचाकर यह महसूस करना पड़ता था कि वे अभी भी शरीर में हैं।
- मौन और शांति का युग: ज्ञानोदय के बाद गहरी, अटूट मौन छा गया। बोलना मुश्किल हो गया। वे अक्सर चुप रहते। बाद में बोलना भी उसी तरह अचानक वापस लौटा, जैसे मौन आया था।
- नया नाम और पहचान: इसी अनुभव के बाद वे धीरे-धीरे आचार्य रजनीश से आगे बढ़कर भगवान श्री रजनीश और अंत में ओशो कहलाए। ज्ञानोदय ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया — अब वे एक नये मनुष्य थे।
- मुख्य संदेश: ओशो बार-बार कहते थे कि ज्ञानोदय कोई उपलब्धि नहीं है। यह “न-घटना” (non-event) है। इसमें कोई “करने” वाला नहीं होता। यह पूर्ण विश्राम, समर्पण और साक्षी भाव में स्वतः घटित होता है। उनकी प्रसिद्ध बात: “मेरी बात पर विश्वास मत करो, स्वयं अनुभव करो।”
रजनीशपुरम — ओरेगन कम्यून (1981–1985) : संघर्ष और विस्फोट
ओशो का अमेरिका जाना 20वीं शताब्दी की सबसे चर्चित आध्यात्मिक घटनाओं में था। 1981 में वे स्वास्थ्य कारणों से अमेरिका पहुँचे और उनके अनुयायियों ने ओरेगन राज्य में रजनीशपुरम नामक एक विशाल आध्यात्मिक नगर बसाया।
यह कम्यून दुनिया की सबसे बड़ी ध्यान-आधारित अंतरराष्ट्रीय कम्यून थी:
- 100 वर्ग मील से अधिक भूमि
- हजारों निवासी
- कृषि, उद्योग, चिकित्सा सुविधाएँ
- ध्यान केंद्र, कला केंद्र
- और लाल-नारंगी वस्त्रों में घूमते लोग
परंतु जैसे ही यह समुदाय बढ़ा, स्थानीय अमेरिकी समाज और राजनीति इससे असहज होने लगे।
संघर्ष के प्रमुख कारण:
- सामुदायिक बढ़त से अमेरिकी राजनैतिक दल चिंतित हुए
- स्थानीय निवासियों का धार्मिक-सांस्कृतिक विरोध
- रजनीशियों पर अपराध और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप
- मीडिया का व्यापक दुष्प्रचार
इन सबके बीच उनकी सचिव मा आनंद शीला के कार्यों ने आग में घी का काम किया। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि अनेक गैरकानूनी गतिविधियाँ ओशो की जानकारी के बिना हुईं। 1985 में ओशो को गिरफ्तार कर कई राज्यों की जेलों में रखा गया, फिर अमेरिका ने उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर किया। यह अध्याय ओशो के जीवन का सबसे विवादास्पद, लेकिन सबसे शक्तिशाली चरण था।
भारत वापसी और अंतिम वर्ष (1986–1990)
1986 में ओशो भारत लौटे। पुणे आश्रम को नए रूप में विकसित किया गया, जिसे बाद में विश्व का सबसे बड़ा ध्यान केंद्र माना गया। इस अवधि में वे अक्सर मौन रहते, कभी-कभी ही प्रवचन देते। उनका स्वास्थ्य अमेरिका की जेलों में रहकर अत्यंत बिगड़ गया था। वे कहते थे कि सरकार ने उन्हें धीमे-धीमे ज़हर दिया। उनके शरीर में रहस्यमय दर्द, कमजोरी और विषैले प्रभाव दिखने लगे। लेकिन आध्यात्मिक ऊर्जा कम नहीं हुई। इन वर्षों में उन्होंने नई ध्यान विधियाँ विकसित कीं, मौन-प्रवचनों की श्रृंखला दी और “ओशो” नाम को स्वीकार किया। उनकी उपस्थिति और अधिक शांत, दिव्य और पारदर्शी हो गई।
Biography of Osho: ओशो की पुस्तकें, प्रवचन और शिक्षाएँ!
ओशो ने स्वयं कोई पुस्तक नहीं लिखी; लेकिन उनके प्रवचनों को रिकॉर्ड कर 600 से अधिक पुस्तकों में प्रकाशित किया गया है।
ये विषयों पर आधारित हैं:
- वेद, उपनिषद, गीता
- बुद्ध, महावीर, कृष्ण, ईसा, लाओत्से
- सूफ़ी रहस्यवाद
- ज़ेन दर्शन
- प्रेम, जीवन, मृत्यु
- ध्यान, चेतना, मनोविज्ञान
- राजनीति, समाज, नैतिकता
- मनुष्य की स्वतंत्रता
उनके प्रवचन साहित्यिक सुंदरता, गहरी अंतर्दृष्टि और दार्शनिक वैचारिकता का अद्भुत संतुलन हैं।
उनकी कुछ प्रसिद्ध पुस्तकों में शामिल हैं:
- ध्यान की पुस्तक
- जीवन का रहस्य
- मृत्यु पर ओशो
- ताओ ते चिंग पर भाष्य
- उपनिषदों की व्याख्या
- धम्मपद की व्याख्या
- प्रेम का मार्ग
- The Book of Secrets (112 ध्यान तकनीकें)
ओशो ने आध्यात्मिकता को जीवंत, आधुनिक, वैज्ञानिक और अनुभव-आधारित रूप दिया।
| क्र.सं. | श्रेणी / केन्द्र | पुस्तक का नाम |
|---|---|---|
| 1 | उपनिषद पर केन्द्रित | सर्वसार उपनिषद |
| 2 | उपनिषद पर केन्द्रित | कैवल्य उपनिषद |
| 3 | उपनिषद पर केन्द्रित | अध्यात्म उपनिषद |
| 4 | उपनिषद पर केन्द्रित | कठोपनिषद |
| 5 | उपनिषद पर केन्द्रित | ईशावास्य उपनिषद |
| 6 | उपनिषद पर केन्द्रित | निर्वाण उपनिषद |
| 7 | उपनिषद पर केन्द्रित | आत्म-पूजा उपनिषद |
| 8 | उपनिषद पर केन्द्रित | केनोपनिषद |
| 9 | उपनिषद पर केन्द्रित | मेरा स्वर्णिम भारत (विविध उपनिषद-सूत्र) |
| 10 | कृष्ण एवं गीता पर केन्द्रित | गीता-दर्शन (आठ भागों में अठारह अध्याय) |
| 11 | कृष्ण एवं गीता पर केन्द्रित | कृष्ण-स्मृति |
| 12 | महावीर पर केन्द्रित | महावीर वाणी (दो भागों में) |
| 13 | महावीर पर केन्द्रित | जिन-सूत्र (दो भागों में) |
| 14 | महावीर पर केन्द्रित | महावीर या महाविनाश |
| 15 | महावीर पर केन्द्रित | महावीर : मेरी दृष्टि में |
| 16 | महावीर पर केन्द्रित | ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया |
| 17 | बुद्ध पर केन्द्रित | एस धम्मो सनंतनो (बारह भागों में) |
| 18 | अष्टावक्र पर केन्द्रित | अष्टावक्र-महागीता (छह भागों में) |
| 19 | कबीर पर केन्द्रित | सुनो भई साधो |
| 20 | कबीर पर केन्द्रित | कहै कबीर दीवाना |
| 21 | कबीर पर केन्द्रित | कहै कबीर मैं पूरा पाया |
| 22 | कबीर पर केन्द्रित | मगन भया रसि लागा |
| 23 | कबीर पर केन्द्रित | घूंघट के पट खोल |
| 24 | कबीर पर केन्द्रित | न कानों सुना न आँखों देखा (कबीर व फरीद) |
| 25 | मीरा पर केन्द्रित | पद घुँघरू बाँध |
| 26 | मीरा पर केन्द्रित | झुक आयी बदरिया सावन की |
| 27 | दादू पर केन्द्रित | सबै सयाने एक मत |
| 28 | दादू पर केन्द्रित | पिव पिव लागी प्यास |
| 29 | जगजीवन पर केन्द्रित | नाम सुमिर मन बावरे |
| 30 | जगजीवन पर केन्द्रित | अरी, मैं तो नाम के रंग छकी |
| 31 | दरिया पर केन्द्रित | कानों सुनी सो झूठ सब |
| 32 | दरिया पर केन्द्रित | अमी झरत बिगसत कँवल |
| 33 | सुन्दरदास पर केन्द्रित | हरि बोलौ हरि बोल |
| 34 | सुन्दरदास पर केन्द्रित | ज्योति से ज्योति जले |
| 35 | धरमदास पर केन्द्रित | जस पनिहार धरे सिर गागर |
| 36 | धरमदास पर केन्द्रित | का सोवै दिन रैन |
| 37 | मलूकदास पर केन्द्रित | कन थोरे कांकर घने |
| 38 | मलूकदास पर केन्द्रित | रामदुवारे जो मरे |
| 39 | पलटू पर केन्द्रित | अजहूं चेत गंवार |
| 40 | पलटू पर केन्द्रित | सपना यह संसार |
| 41 | पलटू पर केन्द्रित | काहे होत अधीर |
| 42 | लाओत्से पर केन्द्रित | ताओ उपनिषद (छह भागों में) |
| 43 | शाण्डिल्य पर केन्द्रित | अथातो भक्ति जिज्ञासा (दो भागों में) |
| 44 | झेन, सूफी और उपनिषद की कहानियाँ | बिन बाती बिन तेल |
| 45 | झेन, सूफी और उपनिषद की कहानियाँ | सहज समाधि भली |
| 46 | झेन, सूफी और उपनिषद की कहानियाँ | दीया तले अंधेरा |
| 47 | अन्य रहस्यदर्शी | भक्ति सूत्र (नारद) |
| 48 | अन्य रहस्यदर्शी | शिव-सूत्र (शिव) |
| 49 | अन्य रहस्यदर्शी | भजगोविन्दम् मूढ़मते (आदिशंकराचार्य) |
| 50 | अन्य रहस्यदर्शी | एक ओंकार सतनाम (नानक) |
| 51 | अन्य रहस्यदर्शी | जगत तरैया भोर की (दयाबाई) |
| 52 | अन्य रहस्यदर्शी | बिन घन परत फुहार (सहजोबाई) |
| 53 | अन्य रहस्यदर्शी | नहीं सांझ नहीं भोर (चरणदास) |
| 54 | अन्य रहस्यदर्शी | संतो, मगन भया मन मोरा (रज्जब) |
| 55 | अन्य रहस्यदर्शी | कहै वाजिद पुकार (वाजिद) |
| 56 | अन्य रहस्यदर्शी | मरौ हे जोगी मरौ (गोरख) |
| 57 | अन्य रहस्यदर्शी | सहज-योग (सरहपा-तिलोपा) |
| 58 | अन्य रहस्यदर्शी | बिरहिनी मंदिर दियना बार (यारी) |
| 59 | अन्य रहस्यदर्शी | दरिया कहै सब्द निरबाना (दरियादास बिहारवाले) |
| 60 | अन्य रहस्यदर्शी | प्रेम रंग-रस ओढ़ चदरिया (दुलन) |
| 61 | अन्य रहस्यदर्शी | हंसा तो मोती चुगै (लाल) |
| 62 | अन्य रहस्यदर्शी | गुरु-परताप साध की संगति (भीखा) |
| 63 | अन्य रहस्यदर्शी | मन ही पूजा मन ही धूप (रैदास) |
| 64 | अन्य रहस्यदर्शी | झरत दसहुँ दिस मोती (गुलाल) |
| 65 | अन्य रहस्यदर्शी | जरथुस्त्र : नाचता-गाता मसीहा (जरथुस्त्र) |
| 66 | प्रश्नोत्तर | नहिं राम बिन ठांव |
| 67 | प्रश्नोत्तर | प्रेम-पंथ ऐसो कठिन |
| 68 | प्रश्नोत्तर | उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र |
| 69 | प्रश्नोत्तर | मृत्योर्मा अमृतं गमय |
| 70 | प्रश्नोत्तर | प्रीतम छवि नैनन बसी |
| 71 | प्रश्नोत्तर | रहिमन धागा प्रेम का |
| 72 | प्रश्नोत्तर | उड़ियो पंख पसार |
| 73 | प्रश्नोत्तर | सुमिरन मेरा हरि करैं |
| 74 | प्रश्नोत्तर | पिय को खोजन मैं चली |
| 75 | प्रश्नोत्तर | साहेब मिल साहेब भये |
| 76 | प्रश्नोत्तर | जो बोलैं तो हरिकथा |
| 77 | प्रश्नोत्तर | बहुरि न ऐसा दाँव |
| 78 | प्रश्नोत्तर | ज्यूँ था त्यूँ ठहराया |
| 79 | प्रश्नोत्तर | मछली बिन नीर |
| 80 | प्रश्नोत्तर | दीपक बारा नाम का |
| 81 | प्रश्नोत्तर | अनहद में बिसराम |
| 82 | प्रश्नोत्तर | लगन महूरत झूठ सब |
| 83 | प्रश्नोत्तर | सहज आसिकी नाहिं |
| 84 | प्रश्नोत्तर | पीवत रामरस लगी खुमारी |
| 85 | प्रश्नोत्तर | रामनाम जान्यो नहीं |
| 86 | प्रश्नोत्तर | साँच साँच सो साँच |
| 87 | प्रश्नोत्तर | आपुई गई हिराय |
| 88 | प्रश्नोत्तर | बहुतेरे हैं घाट |
| 89 | प्रश्नोत्तर | कोंपलें फिर फूट आईं |
| 90 | प्रश्नोत्तर | फिर पत्तों की पाँजेब बजी |
| 91 | प्रश्नोत्तर | फिर अमरित की बूंद पड़ी |
| 92 | प्रश्नोत्तर | चेति सकै तो चेति |
| 93 | प्रश्नोत्तर | क्या सोवै तू बावरी |
| 94 | प्रश्नोत्तर | एक एक कदम |
| 95 | प्रश्नोत्तर | चल हंसा उस देस |
| 96 | प्रश्नोत्तर | कहा कहूँ उस देस की |
| 97 | प्रश्नोत्तर | पंथ प्रेम को अटपटो |
| 98 | मूलभूत मानवीय अधिकार | मूलभूत मानवीय अधिकार |
| 99 | अन्य महत्वपूर्ण | नया मनुष्य : भविष्य की एकमात्र आशा |
| 100 | अन्य महत्वपूर्ण | सत्यम् शिवम् सुंदरम् |
| 101 | अन्य महत्वपूर्ण | रसो वै सः |
| 102 | अन्य महत्वपूर्ण | सच्चिदानन्द |
| 103 | अन्य महत्वपूर्ण | पंडित-पुरोहित और राजनेता : मानव आत्मा के शोषक |
| 104 | अन्य महत्वपूर्ण | ॐ मणि पद्मे हुम् |
| 105 | अन्य महत्वपूर्ण | ॐ शांतिः शांतिः शांतिः |
| 106 | अन्य महत्वपूर्ण | हरि ॐ तत्सत् |
| 107 | अन्य महत्वपूर्ण | एक महान चुनौती : मनुष्य का स्वर्णिम भविष्य |
| 108 | अन्य महत्वपूर्ण | मैं धार्मिकता सिखाता हूँ, धर्म नहीं |
| 109 | तंत्र पर केन्द्रित | संभोग से समाधि की ओर (चार भागों में) |
| 110 | तंत्र पर केन्द्रित | तंत्र-सूत्र (पाँच भागों में) |
| 111 | योग पर केन्द्रित | पतंजलि: योगसूत्र (तीन भागों में) |
| 112 | योग पर केन्द्रित | योग : नये आयाम |
| 113 | गांधी पर केन्द्रित | भारत, गांधी और मैं (नवीन संस्करण यथावत रूप में ‘अस्वीकृति में उठा हाथ’ नाम से प्रकाशित) |
| 114 | गांधी पर केन्द्रित | गांधी पर पुनर्विचार |
| 115 | विचार-पत्र | क्रांति-बीज |
| 116 | विचार-पत्र | पथ के प्रदीप |
| 117 | पत्र-संकलन | अंतर्वीणा |
| 118 | पत्र-संकलन | प्रेम की झील में अनुग्रह के फूल |
| 119 | बोध-कथा | मिट्टी के दीये |
| 120 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति |
| 121 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | रजनीश ध्यान योग |
| 122 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | हसिबा, खेलिबा, धरिबा ध्यानम् |
| 123 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | नेति-नेति |
| 124 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | मैं कहता आँखन देखी |
| 125 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | समाधि कमल |
| 126 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | साक्षी की साधना |
| 127 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | धर्म साधना के सूत्र |
| 128 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | मैं कौन हूँ |
| 129 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | समाधि के द्वार पर |
| 130 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | अपने माहिं टटोल |
| 131 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | ध्यान दर्शन |
| 132 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | तृषा गई एक बूंद से |
| 133 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | ध्यान के कमल |
| 134 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | जीवन संगीत |
| 135 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | जो घर बारे आपना |
| 136 | ध्यान एवं साधना पर केन्द्रित | प्रेम दर्शन |
| 137 | साधना-शिविर | साधना पथ |
| 138 | साधना-शिविर | ध्यान-सूत्र |
| 139 | साधना-शिविर | जीवन ही है प्रभु |
| 140 | साधना-शिविर | माटी कहै कुम्हार सूँ |
| 141 | साधना-शिविर | मैं मृत्यु सिखाता हूँ |
| 142 | साधना-शिविर | जिन खोजा तिन पाइयाँ (19 अध्यायों की पुस्तक) |
| 143 | साधना-शिविर | समाधि के सप्त द्वार (ब्लावट्स्की) |
| 144 | साधना-शिविर | साधना-सूत्र (मेबिल कॉलिन्स) |
| 145 | साधना-शिविर | असंभव क्रांति |
| 146 | साधना-शिविर | रोम-रोम रस पीजिए |
| 147 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | देख कबीरा रोया |
| 148 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | स्वर्ण पाखी था जो कभी और अब है भिखारी जगत का |
| 149 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | शिक्षा में क्रांति |
| 150 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | नये समाज की खोज |
| 151 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | नये भारत की खोज |
| 152 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | नये भारत का जन्म |
| 153 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | नारी और क्रांति |
| 154 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | शिक्षा और धर्म |
| 155 | राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ | भारत का भविष्य |
| 156 | विविध | अमृत-कण |
| 157 | विविध | जीवन रहस्य |
| 158 | विविध | करुणा और क्रांति |
| 159 | विविध | विज्ञान, धर्म और कला शून्य के पार |
| 160 | विविध | प्रभु मंदिर के द्वार पर |
| 161 | विविध | तमसो मा ज्योतिर्गमय |
| 162 | विविध | प्रेम है द्वार प्रभु का |
| 163 | विविध | अंतर की खोज |
| 164 | विविध | अमृत की दिशा |
| 165 | विविध | अमृत वर्षा |
| 166 | विविध | अमृत द्वार |
| 167 | विविध | चित चकमक लागे नाहिं |
| 168 | विविध | एक नया द्वार |
| 169 | विविध | प्रेम गंगा |
| 170 | विविध | समुंद समाना बुंद में |
| 171 | विविध | सत्य की प्यास |
| 172 | विविध | शून्य समाधि |
| 173 | विविध | व्यस्त जीवन में ईश्वर की खोज |
| 174 | विविध | अज्ञात की ओर |
| 175 | विविध | धर्म और आनंद |
| 176 | विविध | जीवन-दर्शन |
| 177 | विविध | जीवन की खोज |
| 178 | विविध | क्या ईश्वर मर गया है |
| 179 | विविध | नानक दुखिया सब संसार |
| 180 | विविध | नये मनुष्य का धर्म |
| 181 | विविध | धर्म की यात्रा |
| 182 | विविध | स्वयं की सत्ता |
| 183 | विविध | सुख और शांति |
| 184 | विविध | अनंत की पुकार |
| 185 | अन्तरंग वार्ताएँ | सम्बोधि के क्षण |
| 186 | अन्तरंग वार्ताएँ | प्रेम नदी के तीरा |
| 187 | अन्तरंग वार्ताएँ | सहज मिले अविनाशी |
| 188 | अन्तरंग वार्ताएँ | उपासना के क्षण |
Biography of Osho: ओशो की मृत्यु
ओशो की मृत्यु 19 जनवरी 1990 को, 58 वर्ष की आयु में, पुणे, भारत में आश्रम में हुई। मौत का आधिकारिक कारण हृदय गति रुकना था, लेकिन उनके कम्यून द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि अमेरिकी जेलों में कथित जहर देने के बाद “शरीर में रहना नरक बन गया था” इसलिए उनकी मृत्यु हो गई। उनकी राख को पुणे के आश्रम में लाओ त्ज़ु हाउस में उनके नवनिर्मित बेडरूम में रखा गया था। ओशो की समाधि पर स्मृतिलेख है, ‘न जन्में न मरे – सिर्फ 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस ग्रह पृथ्वी का दौरा किया’। ओशो की मौत अभी भी एक रहस्य बनी हुई है और जनवरी 2019 में ‘द क्विंट’ के एक लेख में कुछ प्रमुख प्रश्न पूछे गए हैं जैसे “क्या ओशो की हत्या पैसे के लिए की गई थी? क्या उनकी वसीयत नकली है? क्या विदेशी भारत के खजाने को लूट रहे हैं?
उस शाम उन्होंने अपने चिकित्सकों से कहा:
“शरीर थक गया है। मुझे जाने दो। अस्तित्व ने बुलाया है।”
शाम 5 बजे के बाद उनका शरीर शांत हो गया — बिना संघर्ष, बिना पीड़ा, बिल्कुल मौन में। उनके अनुयायियों ने उनके शरीर का उसी रात अंतिम संस्कार कर दिया और उनकी अस्थियाँ पुणे आश्रम में रखी गईं।
ओशो स्मारक पर लिखा है:
“OSHO – Never Born, Never Died. Only Visited This Planet Between 11 Dec 1931 — 19 Jan 1990.”
ओशो के प्रसिद्ध उद्धरण (स्वर्ण वचन)
ओशो के अनुसार जीवन कोई दार्शनिक समस्या नहीं, बल्कि एक रहस्य है। इसे समझने का मार्ग अनुभूति है, तर्क नहीं। वे कहते हैं—“जीवन को समझने की कोशिश मत करो, जीने की कोशिश करो।”
| विषय / श्रेणी | ओशो का विचार (मुख्य वाक्य) | व्याख्या |
|---|---|---|
| जीवन | जीवन कोई समस्या नहीं—एक रहस्य है। | ओशो कहते हैं कि समस्या वही बनती है जिसे हल करना होता है, जबकि जीवन हल करने की वस्तु नहीं है। जीवन का आनंद तब आता है जब हम उसे बिना किसी डर, अपेक्षा और चिंता के जीते हैं। |
| जीवन | वर्तमान में जीना ही जीवन है। | अतीत एक स्मृति है और भविष्य एक कल्पना। जीवन केवल वर्तमान में मौजूद है। ओशो कहते हैं — “यदि तुम वर्तमान में नहीं, तो तुम कहीं भी नहीं।” |
| जीवन | जीवन वहीं खिलता है जहाँ भय नहीं होता। | भय जीवन के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है। भय मुक्त होकर जीना ही आनंद में जीना है। |
| जीवन | जीवन लगातार बदलता है—और यही इसकी सुंदरता है। | ओशो कहते हैं — “जीवन गति है। जो स्थिर है, वह मृत है।” जीवन का सौंदर्य उसकी अनिश्चितता में छुपा है। |
| जीवन | जीवन उत्सव है, गंभीरता नहीं। | ओशो के अनुसार “गंभीरता” मनुष्य को मृत बना देती है। जब हम जीवन को हल्केपन से, हंसते हुए स्वीकारते हैं — तभी जीवन आनंद बनता है। |
| ध्यान | ध्यान कोई अभ्यास नहीं—तुम्हारा स्वभाव है। | ध्यान भीतर पहले से मौजूद है; केवल उसे पहचानना है। |
| ध्यान | ध्यान मन को रोकना नहीं—मन को देखना है। | ओशो बार-बार कहते हैं कि मन को रोकने की कोशिश तनाव पैदा करती है। सिर्फ “देखना” मन को शांत कर देता है। |
| ध्यान | जहां सजगता है, वहीं ध्यान है। | चलते हुए, खाते हुए, हंसते हुए, काम करते हुए — सजगता हो तो ध्यान स्वतः घटता है। |
| ध्यान | ध्यान की यात्रा भीतर की ओर है। | ओशो कहते हैं — “बाहर की यात्रा दुनिया तक ले जाती है, भीतर की यात्रा स्वयं तक।” |
| ध्यान | ध्यान मन को खाली कर देता है—और खाली मन में सत्य की झलक मिलती है। | जब मन पूरी तरह खाली होता है, तब सत्य की पहली झलक मिलती है। |
| प्रेम | प्रेम करो—लेकिन स्वामित्व मत करो। | स्वामित्व प्रेम को नष्ट कर देता है, क्योंकि प्रेम स्वतंत्रता में खिलता है। |
| प्रेम | सच्चा प्रेम अपेक्षा नहीं करता—वह देता है। | यदि प्रेम में लेन-देन है तो वह व्यापार है, प्रेम नहीं। |
| प्रेम | पहले स्वयं को प्रेम करो। | जो अपने आप से प्रेम नहीं कर सकता, वह किसी और को भी सच्चा प्रेम नहीं दे सकता। |
| प्रेम | प्रेम ईश्वर का सबसे प्यारा रूप है। | प्रेम में डूबा मनुष्य ईश्वर के सबसे निकट होता है। |
| प्रेम | प्रेम का मार्ग दिल का मार्ग है—तर्क का नहीं। | प्रेम तर्क से नहीं, केवल हृदय से समझा जा सकता है। |
| स्वतंत्रता | स्वतंत्रता भीतर से आती है। | यदि भीतर से मुक्त नहीं हो, तो बाहर की कोई स्वतंत्रता उपयोगी नहीं। |
| स्वतंत्रता | स्वतंत्रता का अर्थ है—जो तुम हो उसे स्वीकारना। | स्वतंत्र व्यक्ति खुद को जैसा है, वैसा ही स्वीकार करता है। |
| स्वतंत्रता | गुलामी किसी भी रूप में हो—धार्मिक, सामाजिक, मानसिक—वह तुम्हें अपूर्ण बना देती है। | सभी प्रकार की गुलामी मनुष्य को अधूरा रखती है। |
| स्वतंत्रता | स्वतंत्र व्यक्ति अपने सत्यों को जीता है, उधार के सत्य नहीं। | वह दूसरों के बताए सत्य पर नहीं, अपने अनुभव पर जीता है। |
| जागरण / चेतना | जागो! यही मेरा पूरा धर्म है। | ओशो का सबसे बड़ा संदेश — जागरूक हो जाओ। |
| जागरण / चेतना | आत्मज्ञान कोई उपलब्धि नहीं—पहचान है। | यह कुछ नया पाना नहीं, बल्कि जो हम पहले से हैं, उसे पहचानना है। |
| जागरण / चेतना | चेतना की वृद्धि ही मुक्ति है। | जितनी ज्यादा जागरूकता, उतनी ज्यादा मुक्ति। |
| जागरण / चेतना | जब मन शांत होता है, अस्तित्व बोलता है। | मन के शांत होने पर ही सत्य की आवाज सुनाई देती है। |
| जागरण / चेतना | सत्य को जानना हो तो स्वयं को छोड़ना पड़ता है। | अहंकार छोड़ने पर ही सत्य प्रकट होता है। |
| मृत्यु | मृत्यु को समझ लो—जीवन को भी समझ लोगे। | मृत्यु को समझे बिना जीवन को गहराई से नहीं समझा जा सकता। |
| मृत्यु | मृत्यु अंत नहीं, एक नई शुरुआत है। | मृत्यु जीवन का अंत नहीं, केवल रूप बदलना है। |
| मृत्यु | मृत्यु के प्रति सजगता जीवन में गहराई लाती है। | मृत्यु को याद रखने से हर पल की कीमत समझ में आती है। |
| मृत्यु | मृत्यु का डर वहीं होता है जहाँ जीवन अधूरा होता है। | जो जीवन पूरा जीता है, उसे मृत्यु का डर नहीं रहता। |
| स्वयं / आत्म-साक्षात्कार | स्वयं बनो—तुम जैसा कोई और नहीं। | दूसरों की नकल मत करो, अपना मूल स्वरूप जियो। |
| स्वयं / आत्म-साक्षात्कार | दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते स्वयं को मत खोओ। | दूसरों को खुश करने में खुद को मत गंवाओ। |
| स्वयं / आत्म-साक्षात्कार | अपने भीतर देखो—वहीं सत्य का मार्ग है। | बाहरी दुनिया में नहीं, भीतर की यात्रा सच्ची है। |
| स्वयं / आत्म-साक्षात्कार | भीतर देखना ही आध्यात्म है। | सच्चा आध्यात्म बाहरी पूजा नहीं, अंतर्मुखी यात्रा है। |
| स्वयं / आत्म-साक्षात्कार | तुम ही प्रश्न हो—और तुम ही उत्तर। | सारे सवाल और जवाब तुम्हारे भीतर ही हैं। |
| आनंद | आनंद तुम्हारी मौलिक प्रकृति है। | आनंद बाहर से नहीं आता, वह तुम्हारा स्वभाव है। |
| आनंद | जो कुछ करो—आनंद से करो। | काम चाहे छोटा हो या बड़ा, उसे आनंद से करो। |
| आनंद | बाहर आनंद खोजने वाले हमेशा निराश होते हैं। | बाहरी वस्तुओं में आनंद ढूंढना व्यर्थ है। |
| आनंद | साधारणता में आनंद है—असाधारण बनने में नहीं। | साधारण जीवन में ही असली आनंद छिपा है। |
| अहंकार | अहंकार जितना बड़ा—मनुष्यता उतनी छोटी। | जितना अहंकार बढ़ता है, उतनी मनुष्यता घटती है। |
| अहंकार | अहंकार को छोड़ो, जीवन सरल हो जाएगा। | अहंकार छोड़ने से जीवन हल्का और सरल हो जाता है। |
| अहंकार | अहंकार मन की परछाईं है—सजगता आते ही गायब हो जाती है। | जागरूकता आने पर अहंकार अपने आप मिट जाता है। |
| धर्म | धर्म कोई संस्था नहीं—एक अनुभव है। | ओशो के अनुसार धर्म व्यक्तिगत यात्रा है, कोई संगठन नहीं। |
| धर्म | सच्चा धर्म स्वतंत्रता देता है, बंधन नहीं। | सच्चा धर्म बांधता नहीं, मुक्त करता है। |
| धर्म | धार्मिक होना मतलब सजग होना। | सजग रहना ही सबसे बड़ा धर्म है। |
| धर्म | ग्रंथ मार्ग दिखाते हैं—चलना स्वयं पड़ता है। | किताबें सिर्फ इशारा करती हैं, यात्रा खुद करनी पड़ती है। |
| ईश्वर | ईश्वर को मंदिरों में मत खोजो—अपने भीतर खोजो। | सच्चा ईश्वर बाहर नहीं, अपने भीतर है। |
| ईश्वर | ईश्वर अनुभव है, विचार नहीं। | ईश्वर को सोचा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। |
| ईश्वर | ईश्वर तुम्हारी सांसों में है। | हर सांस में ईश्वर का स्पर्श है। |
| ओशो का मुख्य संदेश | मेरा संदेश सरल है—जीवन को उत्सव बना लो। | जीवन को उत्सव की तरह जियो। |
| ओशो का मुख्य संदेश | जीवन का आनंद लो—हर क्षण एक उपहार है। | हर पल को उपहार की तरह स्वीकार करो। |
| ओशो का मुख्य संदेश | अस्तित्व तुम्हारे पक्ष में है। | जो भी होता है, अस्तित्व के पक्ष में होता है। |
| ओशो का मुख्य संदेश | वह जो है, उसे प्रेम करो—जीवन बदल जाएगा। | वर्तमान को प्रेम से स्वीकार लो, सब बदल जाएगा। |
| ओशो का मुख्य संदेश | मैं धर्म नहीं सिखाता, धार्मिकता सिखाता हूँ। | ओशो का स्पष्ट कथन। |
| ओशो का मुख्य संदेश | सत्य खोजो मत—सत्य को जीओ। | सत्य को खोजना नहीं, जीना है। |
| ओशो का मुख्य संदेश | जब तुम बदलते हो, तुम्हारी दुनिया बदल जाती है। | बाहरी दुनिया पहले नहीं, पहले तुम बदलो। |
| ओशो का मुख्य संदेश | मौन ही ईश्वर की भाषा है। | गहरे मौन में ईश्वर से संवाद होता है। |
| ओशो का मुख्य संदेश | जितनी कम अपेक्षा, उतनी अधिक खुशी। | अपेक्षाएँ कम करो, खुशी बढ़ेगी। |
| ओशो का मुख्य संदेश | स्वयं को जान लेना ही परम मुक्ति है। | आत्म-ज्ञान सबसे बड़ी मुक्ति है। |
| ओशो का मुख्य संदेश | साधारण रहो—यही असाधारण है। | साधारणता में असली महानता है। |
| ओशो का मुख्य संदेश | विचार तुम्हारे नहीं हैं—उन्हें देखो और छोड़ दो। | विचारों को सिर्फ देखो, उनसे चिपको मत। |
| ओशो का मुख्य संदेश | जहाँ प्रेम है वहाँ ईश्वर है। | प्रेम ही ईश्वर का सबसे सुंदर रूप है। |
निष्कर्ष: Biography of Osho
ओशो का जीवन साधारण धार्मिक जीवनांत नहीं है — यह साहस, विद्रोह, खोज, प्रेम, स्वतंत्रता, चेतना और सत्य की यात्रा है। उनका अस्तित्व स्वयं में एक प्रयोग था — एक ऐसा प्रयोग जिसमें उन्होंने जीवन को बूंद-बूंद निचोड़कर अनुभव किया और पूरी मानवता के सामने रख दिया। उन्होंने आध्यात्मिकता को पवित्र ग्रंथों में बंद नहीं होने दिया; उन्होंने उसे नृत्य में, हँसी में, प्रेम में, संगीत में, श्वास में, ध्यान में — जीवन के हर क्षण में जीवित रखा।
उनके कई विचारों से मतभेद हो सकते हैं,
उनके जीवन पर विवाद हो सकते हैं,
परंतु एक बात निर्विवाद है:
उन्होंने लाखों लोगों को जीवन के प्रति नए दृष्टिकोण से जीना सिखाया। उनकी शिक्षाओं ने आधुनिक विश्व की आध्यात्मिक समझ को बदल दिया।
आज भी दुनिया भर में हजारों ध्यान केंद्र हैं,
लाखों लोग उनकी पुस्तकें पढ़ते हैं,
और करोड़ों लोग ध्यान की उनकी विधियों का अभ्यास करते हैं।
ओशो का शरीर चला गया,
पर उनके विचार, उनका मौन, उनकी ऊर्जा —
आज भी अनंत की तरह जीवित है।