पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जीवनी: जीवन, कृतियाँ और साहित्यिक योगदान! | Padumlal Punnalal Bakshi Biography | Padumlal Punnalal Bakshi Ka Jeevan Parichay
नमस्कार पाठकों! आज हम एक ऐसे महान साहित्यकार की जीवनी पर चर्चा करेंगे जिन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एक प्रसिद्ध लेखक, संपादक, शिक्षक और आलोचक थे। उनकी जीवनी हमें साहित्य के प्रति समर्पण और सादगी का सबक सिखाती है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में जिन व्यक्तित्वों ने न केवल लेखन द्वारा बल्कि शिक्षण, संपादन और आलोचना के माध्यम से साहित्य को दिशा दी, उनमें पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। Padumlal Punnalal Bakshi Biography
वे द्विवेदी युग के ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने कविता, कहानी, निबंध, आलोचना, उपन्यास, बाल साहित्य, नाटक और अनुवाद—सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनका संपूर्ण जीवन साहित्य, शिक्षा और नैतिक मूल्यों को समर्पित रहा। वे आजीवन स्वयं को “मास्टर” कहलाना गर्व की बात मानते थे और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।
जन्म और परिवार
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई 1894 को खैरागढ़ में हुआ था। खैरागढ़ उस समय छत्तीसगढ़ क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण स्थान था, जो अब भारत के राजनांदगांव जिले में आता है। उनके पिता का नाम श्री पुन्नालाल बख्शी था, जो खैरागढ़ के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। माता का नाम श्रीमती मनोरमा देवी था। बख्शी जी का परिवार साहित्य और संस्कृति से जुड़ा हुआ था, जो उनकी रचनात्मकता को प्रभावित करता था।
उनके पूर्वजों की कहानी भी रोचक है। 14वीं शताब्दी में उनके पूर्वज श्री लक्ष्मीनिधि राजा के साथ मंडला से खैरागढ़ आए थे और तब से यहीं बस गए। बख्शी के पूर्वज फतेह सिंह और उनके पुत्र श्रीमान राजा उमराव सिंह के शासनकाल में श्री उमराव बख्शी राजकवि थे। यह दर्शाता है कि उनका परिवार राजपरिवार से जुड़ा था और कविता तथा साहित्य की परंपरा पुरानी थी।
बचपन में बख्शी जी को उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक था। एक बार वे चंद्रकांता संतति उपन्यास के प्रति इतनी आसक्ति रखते थे कि स्कूल से भाग खड़े हुए। इसके लिए हेडमास्टर पंडित रविशंकर शुक्ल (जो बाद में मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने) ने उन्हें जमकर बेतों से पीटा। यह घटना उनके जीवन की एक मजेदार लेकिन शिक्षाप्रद याद है, जो बताती है कि साहित्य के प्रति उनका प्रेम कितना गहरा था।
इस तरह, उनका जन्म और परिवारिक पृष्ठभूमि ने उन्हें साहित्य की ओर प्रेरित किया। परिवार की सांस्कृतिक विरासत ने उन्हें एक मजबूत आधार दिया, जिस पर उन्होंने अपना करियर बनाया।
शिक्षा
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की प्रारंभिक शिक्षा खैरागढ़ में ही हुई। उन्होंने प्राइमरी शिक्षा पूरी की और फिर उच्च शिक्षा की ओर बढ़े। 1911 में वे मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में बैठे, लेकिन अनुत्तीर्ण हो गए। इस दौरान उनके नाम के साथ पिता का नाम जोड़ने का एक रोचक प्रसंग हुआ। हेडमास्टर एन.ए. गुलाम अली के निर्देशन पर उनके नाम के साथ पुन्नालाल जोड़ा गया, और तब से वे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के नाम से जाने गए।
1912 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन पास की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने बनारस के सेंट्रल हिंदू कॉलेज में प्रवेश लिया। यहां उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और 1916 में बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा के दौरान वे साहित्य से जुड़े रहे और सरस्वती पत्रिका में लिखना शुरू किया।
बाद में, 1961 में उन्होंने बी.ए. की उपाधि प्राप्त की, जो पहले की जानकारी से मेल नहीं खाती, लेकिन प्रदान की गई जानकारी के अनुसार यह उल्लेख है। वास्तव में, यह 1916 का ही संदर्भ हो सकता है, लेकिन हम दिए गए तथ्यों को ही मानेंगे। 1960 में सागर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति पं. द्वारका प्रसाद मिश्र ने उन्हें डी.लिट् की मानद उपाधि प्रदान की।
उनकी शिक्षा ने उन्हें न केवल ज्ञान दिया बल्कि साहित्यिक दुनिया में प्रवेश का द्वार खोला। वे अध्ययन और अध्यापन दोनों में गर्व महसूस करते थे।
विवाह
सन् 1913 में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का विवाह लक्ष्मी देवी के साथ हुआ। यह विवाह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जो उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों से जोड़ता था। विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षा और साहित्यिक कार्य जारी रखा। 1916 में बी.ए. प्राप्त करने के साथ-साथ वे साहित्य सेवा में लगे रहे।
लक्ष्मी देवी उनके जीवन की साथी बनीं, और उनका वैवाहिक जीवन सादा और समर्पित था। यह विवाह उनकी जीवनी का एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो दर्शाता है कि वे पारिवारिक जीवन और साहित्यिक करियर को संतुलित रखते थे।
कार्यक्षेत्र
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से शिक्षा और साहित्य से जुड़ा था। उन्होंने विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षक के रूप में सेवा दी। 1916 में उनकी नियुक्ति स्टेट हाई स्कूल राजनांदगांव में संस्कृत अध्यापक के पद पर हुई। यहां से 1919 तक उन्होंने सेवा की।
इसके बाद, वे कांकेर हाई स्कूल और खैरागढ़ के हाई स्कूल में शिक्षक रहे। दिग्विजय महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। सन् 1929 से 1949 तक खैरागढ़ विक्टोरिया हाई स्कूल में अंग्रेजी शिक्षक रहे। 1959 में वे दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में हिंदी के प्रोफेसर बने और जीवन पर्यंत वहां शिक्षकीय कार्य करते रहे।
उनकी अभिलाषा थी कि अगले जन्म में भी वे मास्टर बनें। यह दर्शाता है कि शिक्षा उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण थी। कार्यक्षेत्र में वे अध्ययन, अध्यापन, लेखन और संपादन में सक्रिय रहे।
सरस्वती पत्रिका के संपादक
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सरस्वती पत्रिका के संपादक के रूप में प्रसिद्ध हुए। सन् 1920 में वे सरस्वती के सहायक संपादक बने, और 1921 में प्रधान संपादक। वे 1925 तक इस पद पर रहे, जब उन्होंने स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया। 1920 ई. से 1927 ई. तक उन्होंने सरस्वती का संपादन किया। कुछ वर्षों तक ‘छाया’ (इलाहाबाद) के भी संपादक रहे।
सरस्वती उस समय हिंदी की प्रमुख पत्रिका थी, जो साहित्य की आमुख थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संपादन में शुरू हुई इस पत्रिका में बख्शी जी ने सहायक संपादक के रूप में योगदान दिया। विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने स्तरिय साहित्य संकलित किया। महाकौशल के रविवासरीय अंक का संपादन 1952 से 1956 तक किया, और 1955 से 1956 तक खैरागढ़ में रहकर सरस्वती का संपादन।
यह भूमिका उनके साहित्यिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी, जहां उन्होंने अनुकरणीय सेवाएं दीं।
साहित्यिक परिचय
साहित्य जगत में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का प्रवेश कवि के रूप में हुआ। उनका नाम द्विवेदी युग के प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाता है। उन्होंने कविता से शुरुआत की, 1916 से 1925 तक स्वच्छंदतावादी फुटकर कविताएं प्रकाशित हुईं। बाद में ‘शतदल’ नाम से कविता संग्रह प्रकाशित हुआ।
लेकिन वास्तविक ख्याति आलोचक और निबंधकार के रूप में मिली। जुलाई 1911 में प्रथम अनुवादित कहानी ‘भाग्य’ प्रकाशित हुई। 1911 में जबलपुर से निकलने वाली ‘हितकारिणी’ में पहली कहानी ‘तारिणी’ प्रकाशित हुई। 1915 में प्रथम निबंध ‘सोना निकालने वाली चीटियाँ’ सरस्वती में छपा। 1916 में ‘झलमला’ कहानी सरस्वती में प्रकाशित।
वे मनसा, वाचा, कर्मणा से विशुद्ध साहित्यकार थे। कीर्ति की लालसा से दूर, निष्काम कर्मयोगी थे। उपन्यासकार के रूप में खुद को असफल मानते थे, लेकिन उनके उपन्यास पढ़कर कोई ऐसा नहीं कह सकता।
आरंभ में दो आलोचनात्मक कृतियां: ‘हिंदी साहित्य विमर्श’ (1924) और ‘विश्व साहित्य’ (1924)। इनमें भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य सिद्धांतों का सामंजस्य है। बाद में ‘हिंदी कहानी साहित्य’ और ‘हिंदी उपन्यास साहित्य’।
निबंधों में जीवन, समाज, धर्म, संस्कृति पर लिखा। शैली में नाटक की रमणीयता और कहानी की रंजकता। व्यंग्य-विनोद की विशेषता। 1929 से 1934 तक पाठ्यपुस्तकें जैसे ‘पंचपात्र’, ‘विश्वसाहित्य’, ‘प्रदीप’ रची।
आचार्य द्विवेदी जी के उत्तराधिकारी
बख्शी जी को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उत्तराधिकारी माना जाता है। 1903 में द्विवेदी जी ने सरस्वती का संपादन शुरू किया। हिंदी साहित्य के विकास में उनका योगदान बड़ा है। द्विवेदी जी के मार्गदर्शन में बख्शी जी विकसित हुए। उनकी रचनाओं से हिंदी साहित्य सुगंधित हुआ।
कृतियां जैसे ‘विश्व-साहित्य’, ‘हिंदी साहित्य विमर्श’, ‘हिंदी कथा-साहित्य’, ‘पंचतंत्र’, ‘नवरात्र’, ‘समस्या और समाधान’, ‘प्रदीप’ में साहित्यिक मीमांसा है। निबंधों में जीवन की घटनाएं, विधवा-समस्या, गृह-जीवन में असंतोष, ‘समाज सेवा’ जैसे विषय।
सम्मान और पुरस्कार
बख्शी जी को कई सम्मान मिले। 1949 में हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि। 1950 में मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन में सभापति। 1951 में डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की अध्यक्षता में जबलपुर में सार्वजनिक अभिनंदन। 1964 में 70वें जन्मदिन पर छात्रों द्वारा अभिनंदन। 1968 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा विशेष सम्मान। 1969 में सागर विश्वविद्यालय से द्वारका प्रसाद मिश्र द्वारा डी.लिट् उपाधि।
प्रमुख कृतियाँ
बख्शी जी की कृतियां विविध हैं। निबंध संग्रह: साहित्य चर्चा, कुछ, और कुछ, यात्री, मेरे प्रिय निबंध, मेरा देश, तुम्हारे लिए। समीक्षात्मक: विश्व साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श। कहानी संग्रह: झलमला, त्रिवेणी। उपन्यास, डायरी, आत्मकथा, संस्मरण, नाटक, बाल साहित्य, काव्य।
1949 से 1957 के बीच: कुछ, और कुछ, यात्री, हिंदी कथा साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, बिखरे पन्ने, तुम्हारे लिए, कथानक। 1968 में: हम-मेरी अपनी कथा, मेरा देश, मेरे प्रिय निबंध, वे दिन, समस्या और समाधान, नवरात्र, जिन्हें नहीं भूलूंगा, हिंदी साहित्य एक ऐतिहासिक समीक्षा, अंतिम अध्याय।
‘यात्री’ यात्रा वृत्तांत है, जिसमें ‘अनन्त पथ की यात्रा’ का वर्णन। उन्होंने मौलिक रचनाओं के अलावा अनुवाद किए: हरिसाधन मुखोपाध्याय, चार्ल्स डिकेंस, बालजाक, अलेक्जेंडर ड्यूमा, गोर्की, टॉमस हार्डी।
यहाँ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी की प्रमुख कृतियाँ विभिन्न विधाओं के अनुसार व्यवस्थित रूप से एक टेबल में दी गई हैं। यह सूची प्रदान की गई जानकारी पर आधारित है और उनकी रचनात्मकता के विस्तृत दायरे को दर्शाती है:
| विधा | कृति का नाम | विशेष टिप्पणी / प्रकाशन वर्ष (जहाँ उपलब्ध) |
|---|---|---|
| कविताएँ | अश्रुदल | प्रारंभिक काव्य रचना |
| कविताएँ | शतदल | स्वच्छंदतावादी कविताओं का संग्रह |
| कविताएँ | पंच-पात्र | काव्य संग्रह |
| नाटक | अन्नपूर्णा का मंदिर | मौरिस मैटरलिंक के ‘Sister Beatrice’ का मर्मानुवाद |
| नाटक | उन्मुक्ति का बंधन | मौरिस मैटरलिंक के ‘The Useless Deliverance’ का छायानुवाद |
| कहानी | कमलावती | प्रमुख कहानी |
| कहानी संग्रह | झलमला | प्रसिद्ध कहानी संग्रह |
| कहानी संग्रह | त्रिवेणी | प्रमुख कहानी संग्रह |
| उपन्यास | कथा-चक्र | प्रमुख उपन्यास |
| बाल उपन्यास | भोला | बाल साहित्य |
| बाल उपन्यास | वे दिन | बाल साहित्य |
| समालोचना / निबंध | हिंदी साहित्य विमर्श | 1924 में प्रकाशित, आलोचनात्मक कृति |
| समालोचना / निबंध | विश्व-साहित्य | 1924 में प्रकाशित, भारतीय-पाश्चात्य साहित्य का सामंजस्य |
| समालोचना / निबंध | हिंदी कहानी साहित्य | हिंदी कहानी पर आलोचना |
| समालोचना / निबंध | हिंदी उपन्यास साहित्य | हिंदी उपन्यास पर आलोचना |
| समालोचना / निबंध | प्रदीप | प्राचीन एवं अर्वाचीन कविताओं का आलोचनात्मक अध्ययन |
| समालोचना / निबंध | समस्या | निबंध संग्रह |
| समालोचना / निबंध | समस्या और समाधान | प्रमुख निबंध संग्रह |
| समालोचना / निबंध | पंचपात्र | पाठ्यपुस्तक एवं निबंध |
| समालोचना / निबंध | पंचरात्र | निबंध संग्रह |
| समालोचना / निबंध | नवरात्र | निबंध संग्रह |
| समालोचना / निबंध | यदि मैं लिखता | प्रसिद्ध कृतियों पर कथात्मक विचार |
| समालोचना / निबंध | हिंदी-साहित्य : एक ऐतिहासिक समीक्षा | ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समीक्षा |
| साहित्यिक-सांस्कृतिक निबंध | बिखरे पन्ने | संस्मरणात्मक निबंध |
| साहित्यिक-सांस्कृतिक निबंध | मेरा देश | देशप्रेम से जुड़े निबंध |
| आत्मकथा / संस्मरण | मेरी अपनी कथा | आत्मकथात्मक रचना |
| आत्मकथा / संस्मरण | जिन्हें नहीं भूलूंगा | संस्मरण |
| आत्मकथा / संस्मरण | अंतिम अध्याय | 1972 में प्रकाशित, अंतिम संस्मरण |
| अन्य निबंध संग्रह | साहित्य चर्चा | निबंध संग्रह |
| अन्य निबंध संग्रह | कुछ, और कुछ | निबंध संग्रह |
| अन्य निबंध संग्रह | यात्री | यात्रा वृत्तांत (अनन्त पथ की यात्रा) |
| अन्य निबंध संग्रह | मेरे प्रिय निबंध | व्यक्तिगत पसंद के निबंध |
| अन्य निबंध संग्रह | तुम्हारे लिए | निबंध संग्रह |
| अन्य निबंध संग्रह | हम-मेरी अपनी कथा | आत्मीय निबंध |
| समग्र रचना | बख्शी ग्रन्थावली | आठ खंडों में (प्रथम संस्करण 2007, संपादक: डॉ. नलिनी श्रीवास्तव, वाणी प्रकाशन, दिल्ली) |
कुछ महत्वपूर्ण बिंदु:
- बख्शी जी ने न केवल मौलिक रचनाएँ कीं, बल्कि चार्ल्स डिकेंस, बालजाक, अलेक्जेंडर ड्यूमा, गोर्की, टॉमस हार्डी आदि विदेशी लेखकों के कार्यों का अनुवाद/सारानुवाद भी किया।
- उनकी अधिकांश रचनाएँ सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुईं, जहाँ वे संपादक भी रहे।
- निबंध शैली में व्यंग्य, विनोद और सरलता उनकी विशेषता थी।
- ग्रन्थावली में उनकी लगभग सभी महत्वपूर्ण रचनाएँ संकलित हैं, जो अध्ययन के लिए सर्वोत्तम स्रोत है।
निधन
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिन्दी साहित्य के ऐसे स्तंभ थे, जिनका जीवन और कृतित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। वे केवल लेखक नहीं, बल्कि साहित्य के सच्चे साधक, शिक्षक और मार्गदर्शक थे। उनका योगदान हिन्दी साहित्य के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
बख्शी जी ने 28 दिसंबर 1971 को पूर्वाह्न 11:25 बजे रायपुर के डी.के. हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए बड़ी क्षति था। वे संत साहित्यकार थे, जिनका व्यक्तित्व प्रतिमान था।