आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय और योगदान! | Biography of Bharatendu Harishchandra | Bharatendu Harishchandra Biography
Bharatendu Harishchandra Biography: भारतेंदु हरिश्चंद्र (9 सितंबर 1850 – 6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन महान पुरुषों में से एक हैं, जिन्हें ‘हिंदी का पितामह’ कहा जाता है। वे वह चमकते सितारे हैं जिन्होंने रीतिकाल की रूढ़िबद्ध और सामंती परंपराओं को तोड़कर हिंदी साहित्य में आधुनिकता का नया युग आरंभ किया। काशी की पावन धरती पर जन्मे इस बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रचनाकार ने मात्र 34 वर्ष की छोटी-सी आयु में ही हिंदी काव्य, नाटक, गद्य, पत्रकारिता और समाज-सुधार के क्षेत्र में इतना विशाल कार्य किया कि आज भी उनका नाम हिंदी नवजागरण के प्रणेता के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने हिंदी को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और जन-जागरण का माध्यम बनाया।
यह ब्लॉग भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन, साहित्यिक योगदान और उनके कार्यों पर विस्तार से चर्चा करेगा। हम सरल भाषा में सभी महत्वपूर्ण जानकारी को कवर करेंगे, ताकि पाठक आसानी से समझ सकें। ब्लॉग को विभिन्न शीर्षकों में विभाजित किया गया है, और जहां जरूरी है, वहां टेबल और पॉइंट्स का उपयोग किया गया है।
परिचय
भारतेंदु हरिश्चंद्र (9 सितंबर 1850 – 6 जनवरी 1885) को आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह के रूप में जाना जाता है। वे हिंदी साहित्य में आधुनिकता लाने वाले पहले रचनाकार थे। उनका मूल नाम ‘हरिश्चंद्र’ था, जबकि ‘भारतेंदु’ उनकी उपाधि थी, जो उन्हें 1880 में काशी के विद्वानों द्वारा दी गई थी। उनका कार्यकाल साहित्यिक युगों की संधि पर स्थित है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामंती संस्कृति को त्यागकर स्वस्थ परंपराओं को अपनाया और नवीनता के बीज बोए। हिंदी साहित्य में आधुनिक काल की शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र से ही मानी जाती है।
वे भारतीय नवजागरण के अग्रदूत थे। उन्होंने अपने साहित्य में देश की गरीबी, पराधीनता और ब्रिटिश शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण किया। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उन्होंने अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग किया। ब्रिटिश राज की शोषक प्रकृति का चित्रण करने के कारण उन्हें युग चारण कहा जाता है। भारतेंदु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया। हिंदी में नाटकों की शुरुआत भारतेंदु से मानी जाती है। उनके नाटक लेखन की शुरुआत 1867 में बंगला के ‘विद्यासुंदर’ नाटक के अनुवाद से हुई। हालांकि नाटक पहले भी लिखे जाते थे, लेकिन खड़ी बोली में नियमित नाटक लिखकर उन्होंने हिंदी नाटक की नींव मजबूत की।
उन्होंने ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’, ‘कविवचनसुधा’ और ‘बाला बोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। वे उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार और ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, संपादक, निबंधकार और कुशल वक्ता भी थे। मात्र 34 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने विशाल साहित्य रचा, जो मात्रा और गुणवत्ता दोनों में अद्भुत है। उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बना। उन्होंने अंग्रेजी शासन के तथाकथित न्याय, जनतंत्र और सभ्यता का पर्दाफाश किया। डॉ. रामविलास शर्मा ने उनकी सराहना में कहा कि देश के रूढ़िवाद का खंडन और महंतों, पंडे-पुरोहितों की लीला प्रकट करना निर्भीक पत्रकार हरिश्चंद्र का काम था।
जीवन परिचय
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी (वाराणसी) के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता गोपालचंद्र एक अच्छे कवि थे, जो ‘गिरधरदास’ उपनाम से कविता लिखते थे। 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु मात्र 7 वर्ष थी। यह समय उनकी आंखें खोलने वाला था, और उनका कृतित्व साक्ष्य है कि उनकी आंखें एक बार खुलीं तो कभी बंद नहीं हुईं। उनके पूर्वज अंग्रेज-भक्त थे और उनकी कृपा से धनवान बने थे। लेकिन भारतेंदु ने स्वतंत्र चिंतन विकसित किया।
बचपन में ही वे माता-पिता के सुख से वंचित हो गए। 5 वर्ष की आयु में मां की मृत्यु हो गई, और 10 वर्ष की आयु में पिता की। विमाता ने उन्हें बहुत सताया, जिससे बचपन का सुख नहीं मिला। शिक्षा की व्यवस्था परंपरागत रूप से हुई। संवेदनशील होने के कारण उनमें स्वतंत्र रूप से देखने-सोचने-समझने की आदत विकसित हुई। पढ़ाई की विषय-वस्तु और पद्धति से उनका मन उचटता रहा। उन्होंने क्वींस कॉलेज, बनारस में प्रवेश लिया, जहां तीन-चार वर्ष तक आए-गए, लेकिन मन बार-बार भागता रहा। उनकी स्मरण शक्ति तीव्र और ग्रहण क्षमता अद्भुत थी, इसलिए परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे।
बनारस में उस समय अंग्रेजी पढ़े-लिखे प्रसिद्ध लेखक राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ थे। भारतेंदु शिष्य भाव से उनके पास जाते और उनसे अंग्रेजी सीखी। स्वाध्याय से उन्होंने संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी और उर्दू भाषाएं सीखीं। काव्य प्रतिभा उन्हें पिता से विरासत में मिली। 5 वर्ष की आयु में उन्होंने एक दोहा रचा:
“लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान। बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान॥”
पिता ने उन्हें सुकवि होने का आशीर्वाद दिया। धन के अत्यधिक व्यय से वे ऋणी हो गए, और दुश्चिंताओं से शरीर शिथिल हुआ। परिणामस्वरूप 1885 में अल्पायु में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जीवन संघर्षपूर्ण था, लेकिन उन्होंने छोटी उम्र में ही बड़ा योगदान दिया।
साहित्यिक परिचय
भारतेंदु के विशाल साहित्यिक योगदान के कारण 1857 से 1900 तक का काल ‘भारतेंदु युग’ कहलाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, भारतेंदु अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा से एक ओर पद्माकर, द्विजदेव की परंपरा में दिखते थे, तो दूसरी ओर बंग देश के माइकेल और हेमचंद्र की श्रेणी में। प्राचीन और नवीन का सुंदर सामंजस्य उनकी कला का विशेष माधुर्य है।
15 वर्ष की आयु से उन्होंने साहित्य सेवा शुरू की। 18 वर्ष में ‘कविवचनसुधा’ पत्रिका निकाली, जिसमें बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। 20 वर्ष में वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बने और आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहलाए। 1868 में ‘कविवचनसुधा’, 1873 में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए ‘बाला बोधिनी’ निकालीं। उन्होंने साहित्यिक संस्थाएं भी स्थापित कीं। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए ‘तदीय समाज’ की स्थापना की। राजभक्ति दिखाते हुए भी देशभक्ति के कारण अंग्रेजों का कोपभाजन बने। 1880 में उन्हें ‘भारतेंदु’ उपाधि मिली।
हिंदी साहित्य को उनकी देन भाषा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में है। भाषा में उन्होंने खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न और हिंदी बोलियों से समृद्ध थी। इसी में उन्होंने गद्य रचा। साहित्य सेवा के साथ समाज-सेवा भी की। कई संस्थाओं की स्थापना में योग दिया। दीन-दुखियों, साहित्यिकों और मित्रों की सहायता को कर्तव्य माना।
प्रमुख कृतियाँ
भारतेंदु की प्रमुख कृतियां विभिन्न विधाओं में हैं। यहां हम उन्हें श्रेणीवार सूचीबद्ध करेंगे।
मौलिक नाटक
नीचे टेबल में उनके मौलिक नाटकों की सूची दी गई है:
| नाटक का नाम | वर्ष/विवरण |
|---|---|
| वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति | 1873, प्रहसन |
| पांचवें पैगंबर | 1873 |
| प्रेमजोगिनी | 1875, प्रथम अंक में चार गर्भांक, नाटिका |
| भारत दुर्दशा | 1880 (या 1876), नाट्य रासक, लास्य रूपक |
| श्री चंद्रावली | 1876, नाटिका |
| विषस्य विषमौषधम् | 1876, भाण |
| अंधेर नगरी | 1881, प्रहसन |
| नीलदेवी | 1881, ऐतिहासिक गीति रूपक |
| सती प्रताप | 1883, अपूर्ण, गीतिरूपक (राधाकृष्णदास द्वारा पूर्ण) |
अनूदित नाट्य रचनाएँ
| नाटक का नाम | विवरण |
|---|---|
| विद्यासुंदर | 1868, संस्कृत ‘चौरपंचाशिका’ के बंगला संस्करण का अनुवाद |
| पाखंड विडंबन | कृष्ण मिश्र के ‘प्रबोधचंद्रोदय’ के तृतीय अंक का अनुवाद |
| धनंजय विजय | 1873, व्यायोग, कांचन कवि के संस्कृत नाटक का अनुवाद |
| कर्पूर मंजरी | 1875, सट्टक, राजशेखर के प्राकृत नाटक का अनुवाद |
| भारत जननी | 1877, नाट्यगीत, बंगला ‘भारतमाता’ पर आधारित |
| मुद्राराक्षस | 1878, विशाखदत्त के संस्कृत नाटक का अनुवाद |
| दुर्लभ बंधु | 1880, शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का अनुवाद |
निबंध संग्रह
- नाटक
- कालचक्र (जर्नल)
- लेवी प्राण लेवी
- भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?
- कश्मीर कुसुम
- जातीय संगीत
- संगीत सार
- हिंदी भाषा
- स्वर्ग में विचार सभा
काव्यकृतियां
- भक्तसर्वस्व (1870)
- प्रेममालिका (1871)
- कार्तिक स्नान
- वैशाख महात्म्य
- प्रेम सरोवर
- प्रेमाश्रुवर्षण
- जैन कुतूहल
- प्रेम सतसई श्रृंगार
- प्रेम माधुरी (1875)
- प्रेम-तरंग (1877)
- उत्तरार्द्ध भक्तमाल (1876-77)
- प्रेम-प्रलाप (1877)
- होली (1879)
- मधु मुकुल (1881)
- राग-संग्रह (1880)
- वर्षा-विनोद (1880)
- विनय प्रेम पचासा (1881)
- फूलों का गुच्छा- खड़ीबोली काव्य (1882)
- प्रेम फुलवारी (1883)
- कृष्णचरित्र (1883)
- प्रातः स्मरण
- उरेहना
- तन्मय लीला
- दानलीला
- रानी छद्म लीला
- संस्कृत लावनी
- बसंत
- मुंह दिखावनी
- उर्दू का स्यापा
- प्रबोधिनी
- नये जमाने की मुकरी
- सुमनांजलि
- बंदर सभा (हास्य व्यंग्य)
- बकरी विलाप (हास्य व्यंग्य)
- विजय वल्लरी
- विजयिनी विजय वैजयंती
- जातीय संगीत
- रिपुनाष्टक
कहानी, यात्रा वृत्तांत, आत्मकथा और उपन्यास
- अद्भुत अपूर्व स्वप्न (कहानी)
- सरयूपार की यात्रा (यात्रा वृत्तांत)
- लखनऊ (यात्रा वृत्तांत)
- एक कहानी- कुछ आपबीती, कुछ जगबीती (आत्मकथा)
- पूर्णप्रकाश (उपन्यास)
- चंद्रप्रभा (उपन्यास)
इन कृतियों से पता चलता है कि भारतेंदु ने सभी विधाओं में योगदान दिया, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।
वर्ण्य विषय
भारतेंदु की विशेषता यह थी कि उन्होंने ईश्वर भक्ति जैसे प्राचीन विषयों के साथ समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम जैसे नवीन विषयों को अपनाया। उनकी रचनाओं में अंग्रेजी शासन का विरोध, स्वतंत्रता की आकांक्षा और जातीय भावबोध दिखता है। सामंती समाज में आधुनिक चेतना फैलाने के लिए उन्होंने लोगों को संगठित किया। उनके साहित्य ने साहित्यकारों को झकझोरा, और ‘भारतेंदु मंडल’ नामक समूह बना।
उनकी कविता विषय अनुसार शृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान और राष्ट्र प्रेम प्रधान है।
- शृंगार रस प्रधान: संयोग और वियोग दोनों का चित्रण। उदाहरण: “देख्यो एक बारहूं न नैन भरि तोहि याते जौन जौन लोक जैहें तही पछतायगी। बिना प्रान प्यारे भए दरसे तिहारे हाय, देखि लीजो आंखें ये खुली ही रह जायगी।”
- भक्ति प्रधान: कृष्ण भक्त और पुष्टिमार्ग अनुयायी। उदाहरण: “बोल्यों करै नूपुर स्त्रीननि के निकट सदा पद तल मांहि मन मेरी बिहरयौ करै। बाज्यौ करै बंसी धुनि पूरि रोम-रोम, मुख मन मुस्कानि मंद मनही हास्यौ करै।”
- सामाजिक समस्या प्रधान: कुरीतियों पर व्यंग्य। उदाहरण: “चूरन अमले जो सब खाते, दूनी रिश्वत तुरत पचाते। चूरन सभी महाजन खाते, जिससे जमा हजम कर जाते।”
- राष्ट्र-प्रेम प्रधान: प्राचीन गौरव का चित्रण। उदाहरण: “भारत के भुज बल जग रच्छित, भारत विद्या लहि जग सिच्छित। भारत तेज जगत विस्तारा, भारत भय कंपिथ संसारा।”
प्राकृतिक चित्रण में वे कम सफल रहे, क्योंकि वे मानव-प्रकृति के शिल्पी थे। लेकिन ‘चंद्रावली’ नाटिका में यमुना वर्णन सजीव है: “कै पिय पद उपमान जान यह निज उर धारत, कै मुख कर बहु भृंगन मिस अस्तुति उच्चारत। कै ब्रज तियगन बदन कमल की झलकत झांईं, कै ब्रज हरिपद परस हेतु कमला बहु आईं॥”
एक और उदाहरण: “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये। झुके कूल सों जल परसन हित मनहूँ सुहाये॥”
भाषा
भारतेंदु के समय में राजकाज की भाषा फारसी थी, संभ्रांत वर्ग में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा था, साहित्य में ब्रजभाषा का बोलबाला था, और उर्दू चलन में थी। उन्होंने लोकभाषाओं और फारसी-मुक्त उर्दू पर आधारित खड़ी बोली विकसित की। आज की हिंदी उनकी देन है, इसलिए उन्हें आधुनिक हिंदी का जनक माना जाता है। उन्होंने साहित्य में आधुनिक चेतना जोड़ी और इसे ‘जन’ से जोड़ा।
उनकी रचनाधर्मिता में दोहरापन है: कविता ब्रजभाषा में, लेकिन अन्य विधाओं में खड़ी बोली में सफल। वे आधुनिक खड़ी बोली गद्य के उन्नायक हैं। काव्य भाषा ब्रजभाषा की परिष्कृत, जिसमें उर्दू और अंग्रेजी शब्द मिले। गद्य सरल, व्यवहारिक, मुहावरों से युक्त।
शैली
भारतेंदु के काव्य में विभिन्न शैलियां:
- रीतिकालीन रसपूर्ण अलंकार शैली – शृंगारिक कविताओं में।
- भावात्मक शैली – भक्ति पदों में।
- व्यंग्यात्मक शैली – समाज-सुधार रचनाओं में।
- उद्बोधन शैली – देश-प्रेम कविताओं में।
रस
वे सभी रसों में कविता रचे, लेकिन शृंगार और शांत रस प्रधान। शृंगार के दोनों पक्ष सुंदर वर्णित। हास्य रस की उत्कृष्ट योजना।
छन्द
उन्होंने सभी प्रचलित छंद अपनाए: हिंदी के चौपाई, छप्पय, रोला, सोरठा, कुंडलियां, कवित्त, सवैया, घनाक्षरी; संस्कृत के वसंत तिलका, शार्दूल विक्रीड़ित, शालिनी; बंगला के पयार; उर्दू के रेखता, गजल। लोक छंद जैसे कजली, ठुमरी, लावनी, मल्हार, चैती भी प्रयोग किए।
अलंकार
अलंकार सहज: उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, संदेह प्रधान। शब्दालंकार भी। उदाहरण: “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। झुके कूल सों जल परसन हित मनहु सुहाए॥” (उत्प्रेक्षा और अनुप्रास)
महत्वपूर्ण कार्य
नवीन साहित्यिक चेतना और स्वभाषा प्रेम का सूत्रपात
आधुनिक हिंदी साहित्य में उनका स्थान महत्वपूर्ण। बहुमुखी प्रतिभा से कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध में देन। हिंदी में नवजागरण लाए। भाव, भाषा, शैली में नवीनता जोड़ी। आधुनिक हिंदी के जन्मदाता। हिंदी नाटकों का सूत्रपात। साहित्यिक नेता, जिनसे कई लेखक प्रेरित। मातृभाषा सेवा में जीवन और धन अर्पित। उनका मूलमंत्र: “निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल॥”
“विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार॥”
1882 में हंटर कमीशन के समक्ष हिंदी को अदालती भाषा बनाने की वकालत की। उदाहरण: सम्मन और अर्जी में हिंदी के लाभ बताए। 1868 में ‘उर्दू का स्यापा’ व्यंग्य कविता: “है है उर्दू हाय हाय। कहाँ सिधारी हाय हाय। मेरी प्यारी हाय हाय। मुंशी मुल्ला हाय हाय।” (आदि)
साम्राज्य-विरोधी चेतना तथा स्वदेश प्रेम का विकास
हिंदी साहित्य को साम्राज्य-विरोधी दिशा दी। 1870 में ‘लेवी प्राण लेवी’ लेख से चेतना प्रसार। 1874 में अमेरिका जैसी स्वतंत्रता की बात। तदीय समाज स्थापित, स्वदेशी प्रतिज्ञा। विलायती कपड़ों का बहिष्कार। प्रतिज्ञा पत्र: स्वदेशी कपड़ा पहनने की शपथ। साहित्य में ‘जन’ समावेश। गरीबी, शोषण का चित्रण। अंग्रेजों का कोपभाजन बने। शोषण समझ: अंग्रेज दरिद्र आते, कुबेर बनकर जाते। धन अपवहन (ड्रेन ऑफ वेल्थ) की समझ। ‘भारत-दुर्दशा’ में: “अंगरेजी राज सुखसाज सजे अति भारी, पर सब धन विदेश चलि जात ये ख्वारी।”
कविवचनसुधा में आह्वान: सन्नद्ध हो जाओ, धन बाहर न जाए।
भारत की सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए प्रयत्न
1976 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। वैश्विक चेतना: 1884 में ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ भाषण। कुरीतियां त्याग, शिक्षा, उद्योग, एकता, आत्मनिर्भरता का आह्वान। उदाहरण: पूर्वजों की खगोलीय खोजों का जिक्र, उन्नति की घुड़दौड़। पेट भरने और उन्नति साथ करने की बात। ‘भारत दुर्दशा’ में: “रोअहुं सब मिलिकै आवहुं भारत भाई। हा, हा! भारत दुर्दशा देखी न जाई॥”
अंग्रेजी शासन के खोखले दावों का खंडन। रेल आदि से धन बाहर जाने का विश्लेषण। स्त्री-पुरुष समानता: स्त्री शिक्षा आवश्यक। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में भरत-वाक्य: सज्जनों को दुख न हो, उपधर्म छूटे, मत्सर त्याग, नारी-नर समान।
पत्रकारिता के क्षेत्र में दिया अहम योगदान
पत्रकारिता में विशेष योग। ब्रिटिश काल में अंग्रेजी शानदार, लेकिन हिंदी प्रति आकर्षण कम। हिंदी गद्य विकास। ‘कविवचनसुधा’ (प्रथम पत्र), ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ (1873, बाद में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’), ‘नवोदिता हरिश्चंद्र चंद्रिका’ (1884, दो अंक)। नारी उत्थान के लिए ‘बालाबोधिनी’।
उनके बाद ‘आनंद कादंबिनी’, ‘ब्राह्मण’, ‘भारत मित्र’, ‘हिंदी प्रदीप’, ‘काशी पत्रिका’, ‘मित्र विलास’ आदि। द्विवेदी युग में ‘सरस्वती’ पत्रिका।
निष्कर्ष: Bharatendu Harishchandra Biography
भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के सच्चे पितामह हैं। मात्र 34 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने खड़ी बोली को मजबूत आधार दिया, हिंदी नाटक, पत्रकारिता और गद्य की नींव रखी। उन्होंने रीतिकाल की विकृत परंपराओं को त्यागकर नवजागरण का सूत्रपात किया, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक सुधार और साम्राज्य-विरोधी चेतना को साहित्य का विषय बनाया। ‘भारत दुर्दशा’, ‘अंधेर नगरी’ जैसे नाटकों और ‘कविवचनसुधा’ जैसी पत्रिकाओं से उन्होंने जनता की आवाज बुलंद की। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सपना देखा और उसे साकार करने की दिशा में जीवन अर्पित कर दिया। उनका योगदान आज भी हिंदी साहित्य को प्रेरित करता है।