डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी: प्रारंभिक जीवन, करियर और उपलब्धियाँ! | Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography | Biography of Dr. Sarvepalli Radhakrishnan
नमस्कार पाठकों! क्या आप जानते हैं कि एक शिक्षक की सादगी और विद्वत्ता उसे भारत के सर्वोच्च पद तक पहुँचा सकती है? आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography, जो केवल एक जीवन कहानी नहीं, बल्कि प्रेरणा का अद्भुत स्रोत है। साधारण परिवार में जन्म लेकर उन्होंने शिक्षा, दर्शन और राजनीति के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाई। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने लोकतंत्र और संस्कृति को नई दिशा दी। उनका जन्मदिन 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। आइए जानें उनके प्रारंभिक जीवन, करियर और असाधारण उपलब्धियों की रोचक यात्रा।
परिचय
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (5 सितंबर 1888 – 17 अप्रैल 1975) भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (1952-1962) और द्वितीय राष्ट्रपति (1962-1967) रहे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिंदू विचारक थे। उनके इन गुणों के कारण 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। उनका जन्मदिन 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को श्रद्धांजलि है।
राधाकृष्णन ने भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक कार्य किया। वे आंध्र प्रदेश के एक छोटे शहर में जन्मे थे और एक प्रतिष्ठित विद्वान, दार्शनिक तथा राजनेता थे। उनके कार्यों का भारत के शैक्षिक और राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और मैसूर विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उन्हें पूर्वी धर्म और नैतिकता के स्पैल्डिंग प्रोफेसरशिप से सम्मानित किया गया। उनके तुलनात्मक धर्म और दर्शन के कार्य ने भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया से परिचित कराया।
वे शिक्षा को समाज के लिए एक परिवर्तनकारी उपकरण मानते थे। उनके राजनीतिक जीवन में सोवियत संघ में भारतीय राजदूत (1949-1952) और उपराष्ट्रपति जैसे पद शामिल थे। राष्ट्रपति के रूप में वे अपनी बुद्धिमत्ता, विद्वत्ता और भारतीय संस्कृति की समझ के लिए जाने जाते थे। उनका कार्यकाल लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने की प्रतिबद्धता से चिह्नित था। उनका निधन 17 अप्रैल 1975 को हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।
जन्म एवं परिवार
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के चित्तूर जिले के तिरुत्तनी ग्राम में 5 सितंबर 1888 को एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ। तिरुत्तनी ग्राम चेन्नई से लगभग 84 किलोमीटर दूर है। 1960 तक यह आंध्र प्रदेश में था, लेकिन अब तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में है। उनका जन्म स्थान एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध है। उनके पूर्वज पहले ‘सर्वेपल्ली’ नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में तिरुत्तनी की ओर चले गए।
वे एक निर्धन लेकिन विद्वान ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरासमियाह था और माता का नाम सीताम्मा था। पिता राजस्व विभाग में कार्यरत थे और बड़े परिवार का भरण-पोषण करते थे। परिवार में पांच पुत्रियां और एक पुत्र थे, जिसमें राधाकृष्णन दूसरे स्थान पर थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कठिन थी, इसलिए बचपन में उन्हें विशेष सुख नहीं मिला। यह प्रारंभिक जीवन की कठिनाइयां ही थीं जिन्होंने उन्हें मजबूत बनाया और विद्वत्ता की ओर प्रेरित किया।
विद्यार्थी जीवन
राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरुत्तनी और तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर व्यतीत हुआ। पहले आठ वर्ष तिरुत्तनी में गुजारे। उनके पिता पुराने विचारों के थे, लेकिन उन्होंने उन्हें क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में 1896-1900 तक पढ़ाया। अगले चार वर्ष (1900-1904) वेल्लूर में शिक्षा हुई। फिर मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई की। वे बचपन से मेधावी थे।
12 वर्षों के अध्ययन में उन्होंने बाइबिल के महत्वपूर्ण अंश याद किए और विशिष्ट योग्यता का सम्मान पाया। इस उम्र में स्वामी विवेकानंद और अन्य विचारकों का अध्ययन किया। 1902 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और छात्रवृत्ति मिली। 1905 में कला संकाय प्रथम श्रेणी में पास किया, मनोविज्ञान, इतिहास और गणित में विशेष योग्यता मिली। क्रिश्चियन कॉलेज ने छात्रवृत्ति दी। दर्शनशास्त्र में एमए करने के बाद 1918 में मैसूर महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक बने, बाद में प्रधानाध्यापक। उनके लेखों और भाषणों ने विश्व को भारतीय दर्शन से परिचित कराया।
सर्वपल्ली राधाकृष्णन की शिक्षा
उनकी प्राथमिक शिक्षा थिरुट्टानी के केवी हाई स्कूल में हुई। 1896 में तिरुपति के हरमन्सबर्ग इवेंजेलिकल लूथरन मिशन स्कूल और वालाजापेट के सरकारी हाई सेकेंडरी स्कूल में दाखिला लिया। हाई स्कूल के लिए वेल्लोर के वूरहीस कॉलेज में पढ़े। 17 वर्ष की आयु में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिला लिया और 1906 में स्नातक तथा स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की।
उनका शोध प्रबंध “वेदांत की नैतिकता और उसकी आध्यात्मिक मान्यताएँ” था, जो वेदांत में नैतिकता की कमी के आरोप का जवाब था। प्रोफेसर रेवरेंड विलियम मेस्टन और डॉ. अल्फ्रेड जॉर्ज हॉग ने प्रशंसा की। 20 वर्ष की आयु में शोध प्रबंध प्रकाशित हुआ। यह उनकी शिक्षा की मजबूत नींव दर्शाता है।
राधाकृष्णन का शैक्षणिक जीवन
अप्रैल 1909 में मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज के दर्शनशास्त्र विभाग में नियुक्त हुए। 1918 में मैसूर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने, जहां मैसूर महाराजा कॉलेज में पढ़ाया। उन्होंने द क्वेस्ट, जर्नल ऑफ फिलॉसफी और इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एथिक्स जैसी पत्रिकाओं में लेख लिखे।
पहली पुस्तक “रवींद्रनाथ टैगोर का दर्शन” पूरी की, जिसमें टैगोर को भारतीय भावना की अभिव्यक्ति कहा। 1920 में “समकालीन दर्शन में धर्म का शासन” प्रकाशित हुआ। 1921 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने, जहां किंग जॉर्ज पंचम चेयर संभाला। जून 1926 में ब्रिटिश साम्राज्य विश्वविद्यालय कांग्रेस में प्रतिनिधित्व किया, सितंबर 1926 में हार्वर्ड में अंतर्राष्ट्रीय दर्शनशास्त्र कांग्रेस में भाग लिया।
1929 में ऑक्सफोर्ड के मैनचेस्टर कॉलेज में हिबर्ट लेक्चर दिए, जो “एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ लाइफ” पुस्तक बनी। 1929 में मैनचेस्टर कॉलेज में आमंत्रित, तुलनात्मक धर्म पर व्याख्यान दिए। जून 1931 में नाइट की उपाधि मिली, लेकिन स्वतंत्रता के बाद डॉक्टर उपाधि प्रयोग की। 1931-1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति। 1936 में ऑक्सफोर्ड में स्पैल्डिंग प्रोफेसर। 1937 में साहित्य नोबेल नामांकन। 1939-1948 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति।
Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography: दाम्पत्य जीवन
1903 में 14 वर्ष की आयु में सिवाकामू से विवाह हुआ, जब पत्नी 10 वर्ष की थीं। तीन वर्ष बाद साथ रहना शुरू किया। सिवाकामू ने पारंपरिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन तेलुगु और अंग्रेजी जानती थी। 1907 में राधाकृष्णन ने कला स्नातक प्रथम श्रेणी में पास किया। 1908 में पुत्री सुमित्रा का जन्म। 1909 में दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर। ट्यूशन से आमदनी की। 1908 में शोध लेख लिखा। वेदों, उपनिषदों, हिंदी और संस्कृत का अध्ययन किया। यह दर्शाता है कि वैवाहिक जीवन के साथ शिक्षा जारी रही।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति और ऑक्सफोर्ड में योगदान
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को विश्व पटल पर स्थापित किया। वे 20वीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली तुलनात्मक धर्म और दर्शन के विद्वान माने जाते हैं। उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति और ऑक्सफोर्ड में भूमिका ने पूर्वी विचारधारा को पश्चिम तक पहुंचाया। यहां उनके प्रमुख योगदान बिंदुओं में:
- ऑक्सफोर्ड में पहला भारतीय प्रोफेसर: 1936 में उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में स्पैल्डिंग प्रोफेसर ऑफ ईस्टर्न रिलिजन एंड एथिक्स नियुक्त किया गया। वे ऑक्सफोर्ड में कुर्सी संभालने वाले पहले भारतीय बने, जो एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। यह पद 1952 तक उनके पास रहा।
- ऑल सोल्स कॉलेज के फेलो: नियुक्ति के साथ ही उन्हें प्रतिष्ठित ऑल सोल्स कॉलेज का फेलो चुना गया, जो ऑक्सफोर्ड की सर्वोच्च शैक्षणिक सम्मान में से एक है।
- भारतीय दर्शन का वैश्विक परिचय: ऑक्सफोर्ड में उन्होंने पूर्वी धर्मों (हिंदू, बौद्ध आदि) और नैतिकता पर व्याख्यान दिए। इससे पश्चिमी जगत में भारतीय दर्शन को गहराई से समझने का अवसर मिला। उन्होंने पश्चिमी केंद्रित दर्शन को चुनौती दी और भारतीय परंपराओं की प्रासंगिकता सिद्ध की।
- प्रमुख व्याख्यान श्रृंखलाएं: 1926 में उप्टन लेक्चर्स (द हिंदू व्यू ऑफ लाइफ), 1929 में हिबर्ट लेक्चर्स (एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ लाइफ) दिए। ये पुस्तकें विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हुईं और पूर्व-पश्चिम के बीच पुल बने।
- अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान:
- 1931 में नाइटहुड (सर की उपाधि) शिक्षा के लिए।
- 1954 में भारत रत्न (सर्वोच्च नागरिक सम्मान)।
- 1963 में ब्रिटेन का ऑर्डर ऑफ मेरिट।
- 1954 में जर्मनी का पोर ले मेरिट और मैक्सिको का ऑर्डर ऑफ द एज़्टेक ईगल।
- 1975 में टेम्पलटन पुरस्कार (पूर्व-पश्चिम संस्कृतियों के बीच समझ बढ़ाने के लिए)।
- नोबेल पुरस्कार के लिए 27 बार नामांकन (16 साहित्य, 11 शांति)।
- टेम्पलटन पुरस्कार की राशि उन्होंने ऑक्सफोर्ड को दान की।
- वैश्विक प्रभाव: उनकी विद्वत्ता ने उन्हें यूनेस्को प्रतिनिधि, सोवियत संघ में राजदूत और भारत के राष्ट्रपति बनाया। वे भारत-पश्चिम के बीच पुल बने, शांति और धार्मिक सद्भाव के प्रतीक रहे। ऑक्सफोर्ड में उनका योगदान आज भी पूर्वी अध्ययन को मजबूत करता है।
हिंदू शास्त्रों का गहरा अध्ययन
क्रिश्चियन संस्थाओं में पढ़ाई से पश्चिमी मूल्य प्रभावित हुए, लेकिन हिंदुत्व की आलोचना को चुनौती माना और हिंदू शास्त्रों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि भारतीय आध्यात्म समृद्ध है और आलोचनाएं निराधार हैं। इससे वे भारतीय संस्कृति के करीब आए।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने क्रिश्चियन मिशनरी स्कूलों में पढ़ाई के दौरान हिंदू धर्म की आलोचना सुनी। इस चुनौती को उन्होंने अवसर में बदला और हिंदू शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। यहाँ उनके इस अध्ययन के प्रमुख बिंदु दिए गए हैं:
- पश्चिमी आलोचनाओं का जवाब: क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिंदुत्व को जड़ और नैतिकता-रहित बताए जाने पर राधाकृष्णन ने इसे चुनौती माना और स्वयं शास्त्रों की जांच की।
- वेदों और उपनिषदों का गहरा अध्ययन: उन्होंने वेदों, उपनिषदों और अन्य प्राचीन ग्रंथों को मूल रूप में पढ़ा, जिससे उन्हें भारतीय आध्यात्म की समृद्धि का पता चला।
- तुलनात्मक दृष्टिकोण: पश्चिमी और भारतीय विचारधाराओं की तुलना की, और पाया कि भारतीय संस्कृति में चेतना, सत्य और जीवन का गहरा संदेश मौजूद है।
- सामान्य जन में भी सत्य की उपस्थिति: यह समझा कि दूर-दराज के गरीब और अनपढ़ हिंदू भी प्राचीन सत्य को सहज रूप से जानते हैं।
- निष्कर्ष – भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता: उन्होंने पाया कि हिंदू धर्म धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है, जो प्राणी को जीवन का सच्चा मार्ग दिखाता है।
- आलोचना को परिशुद्धि का माध्यम बनाया: आलोचनाओं ने उन्हें और गहराई से शोध करने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनकी आस्था और मजबूत हुई।
शिक्षक दिवस: डॉ. राधाकृष्णन की अमर विरासत (5 सितंबर – शिक्षकों का उत्सव)
- शिक्षक दिवस की शुरुआत: भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है, क्योंकि यह महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है।
- राधाकृष्णन का विशेष योगदान: वे मैसूर, कलकत्ता और ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहे और शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली माध्यम माना।
- उनका विनम्र सुझाव: 1962 में राष्ट्रपति बनने पर जब छात्रों और मित्रों ने उनके जन्मदिन को विशेष रूप से मनाने की योजना बनाई, तो उन्होंने कहा – “मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय इस दिन को सभी शिक्षकों के सम्मान में मनाओ।”
- प्रसिद्ध उद्धरण:
- “शिक्षक देश के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क होने चाहिए।”
- “शिक्षण सबसे सम्मानजनक पेशा है; शिक्षक राष्ट्र के निर्माता और भविष्य के वास्तुकार होते हैं।”
- सरकारी सम्मान: इस दिन भारत सरकार द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार से उत्कृष्ट शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है।
- आज का उत्सव: स्कूल-कॉलेजों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, भाषण, निबंध लेखन और शिक्षकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। छात्र अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
- स्थायी प्रेरणा: डॉ. राधाकृष्णन की विरासत आज भी लाखों शिक्षकों और छात्रों को प्रेरित करती है कि शिक्षा ही जागरूक और प्रगतिशील समाज का आधार है।
मानद उपाधियाँ
यूरोप-अमेरिका से लौटने पर विश्वविद्यालयों ने मानद उपाधियां दीं। 1928 में नेहरू से मुलाकात। राजनीतिक भाषण दिए। 1929 में मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में व्याख्यान। सेवाएं:
- 1931-36: आंध्र विश्वविद्यालय वाइस चांसलर
- 1936-52: ऑक्सफोर्ड प्राध्यापक
- 1937-41: जॉर्ज पंचम कॉलेज प्रोफेसर
- 1939-48: काशी हिंदू विश्वविद्यालय चांसलर
- 1953-62: दिल्ली विश्वविद्यालय चांसलर
- 1946: यूनेस्को प्रतिनिधि
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का राजनीतिक और राजनयिक सफर
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का राजनीतिक जीवन देर से शुरू हुआ, लेकिन उनकी विद्वत्ता और नैतिकता ने उन्हें भारत के सर्वोच्च पदों तक पहुंचाया। यहां उनके प्रमुख राजनीतिक, राजनयिक और करियर के पड़ाव बिंदुओं में:
- संविधान सभा में योगदान (1947–1949) स्वतंत्र भारत की संविधान सभा के सदस्य बने। गैर-राजनीतिक व्यक्ति होने के बावजूद उनकी बुद्धिमत्ता को देखते हुए चुना गया। 14-15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक रात्रि को ठीक 12 बजे अपना भाषण समाप्त किया, ताकि नेहरू जी शपथ ग्रहण कर सकें।
- सोवियत संघ में राजदूत (1949–1952) पंडित नेहरू ने दार्शनिक को राजनयिक बनाया। मॉस्को में गैर-पारंपरिक शैली अपनाई – देर रात की बैठकों में 10 बजे तक ही रहते। फिर भी सबसे प्रभावी भारतीय राजदूत साबित हुए। भारत-रूस संबंधों को मजबूती दी।
- भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (1952–1962) नए संवैधानिक पद पर चुने गए। राज्यसभा के सभापति भी रहे। राजनीतिक दल से न जुड़े होने के बावजूद सदन में अपनी विनम्रता, दृढ़ता और हल्के-फुल्के हास्य से सभी को प्रभावित किया। संसद के सदस्यों ने उनकी कार्यशैली की खूब सराहना की।
- भारत के द्वितीय राष्ट्रपति (1962–1967) 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक राष्ट्रपति पद संभाला। लोकतंत्र, भारतीय दर्शन और संस्कृति की आवाज बुलंद की। शिक्षा, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक एकता पर विशेष जोर दिया। विश्व मंच पर भारत की बौद्धिक छवि मजबूत की गई।
- राजनीति में अनोखी विशेषता कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, फिर भी नेहरू के विश्वास पर उच्च पदों पर पहुंचे। उनका शासनकाल शांत, संतुलित और मूल्यों पर आधारित रहा।
भारत रत्न और अन्य सम्मान
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, भारत के महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और पूर्व राष्ट्रपति, को उनके असाधारण योगदान के लिए दुनिया भर से सम्मान मिले। शिक्षा, दर्शन और संस्कृति में उनके कार्य ने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। यहां उनके प्रमुख पुरस्कार और सम्मान बिंदुओं में दिए गए हैं:
- भारत रत्न (1954): भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, जो उनकी महान दार्शनिक एवं शैक्षिक उपलब्धियों के लिए प्रदान किया गया। स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में यह पुरस्कार राष्ट्र की ओर से उनकी सर्वोच्च मान्यता थी।
- नाइट बैचलर उपाधि (1931): ब्रिटिश राज द्वारा शिक्षा क्षेत्र में योगदान के लिए जॉर्ज पंचम द्वारा दी गई ‘सर’ की उपाधि। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने इसे छोड़कर ‘डॉ.’ उपाधि अपनाई।
- ऑर्डर ऑफ मेरिट (1963): यूनाइटेड किंगडम द्वारा मानद सदस्यता, उच्चतम ब्रिटिश सम्मानों में से एक, उनके वैश्विक प्रभाव के लिए।
- पोर ले मेरिट फॉर साइंस एंड आर्ट्स (1954): जर्मनी द्वारा विज्ञान और कला क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु।
- ऑर्डर ऑफ द एज़्टेक ईगल (1954): मैक्सिको द्वारा प्रथम श्रेणी का यह सम्मान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रतिष्ठा दर्शाता है।
- जर्मन बुक ट्रेड पीस प्राइज़ (1961): विश्व शांति और साहित्य में योगदान के लिए।
- साहित्य अकादमी फैलोशिप (1968): भारत में साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान, वे पहले प्राप्तकर्ता बने।
- टेम्पलटन पुरस्कार (1975): अहिंसा, ईश्वर के एकत्व और करुणा के प्रसार के लिए, गैर-ईसाई में पहले प्राप्तकर्ता।
- नोबेल पुरस्कार नामांकन: रिकॉर्ड 27 बार (16 बार साहित्य में, 11 बार शांति में) नामांकित, जो उनकी वैश्विक प्रतिभा का प्रमाण है।
- ब्रिटिश अकादमी फेलो (1938): ब्रिटिश अकादमी द्वारा चुने गए मानद सदस्य।
सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु 17 अप्रैल 1975 को हुई थी। उस समय उनकी आयु 86 वर्ष थी। वे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति (1962-1967) और प्रथम उपराष्ट्रपति (1952-1962) रह चुके थे। राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने 1967 में सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लिया था। अंतिम आठ वर्ष उन्होंने चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) के मायलापुर में अपने द्वारा डिजाइन किए गए घर में बिताए।
उनकी पत्नी सिवाकामू का निधन पहले ही 26 नवंबर 1956 को हो चुका था, जिसके बाद वे विधुर रहे और कभी पुनर्विवाह नहीं किया। जीवन के अंतिम दिनों में वे लंबी बीमारी से जूझ रहे थे। वे एक नर्सिंग होम में थे, जहां उन्हें हृदय संबंधी समस्याओं (कार्डियक फेल्योर या हार्ट फेल्योर) का सामना करना पड़ा। कुछ स्रोतों के अनुसार, बार-बार हृदय गति रुकने की घटनाएं हुईं, जिसके कारण उनका निधन हुआ। अन्य स्रोत इसे प्राकृतिक कारणों (natural causes) या लंबी बीमारी से जोड़ते हैं।
17 अप्रैल 1975 को मद्रास में उनका देहांत हो गया। पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद और राजनेता के रूप में उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनका जन्मदिन 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो शिक्षा के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाता है। उनकी मृत्यु ने भारत को एक युग का अंत बताया, लेकिन उनके विचार और योगदान अनंत काल तक प्रेरणा देते रहेंगे।
सर्वपल्ली राधाकृष्णन के पुरस्कार और सम्मान
- 1954: भारत रत्न
- 1931: नाइट उपाधि
- 1954: पोर ले मेरिट (जर्मनी)
- 1954: ऑर्डर ऑफ द एज़्टेक ईगल (मैक्सिको)
- 1963: ऑर्डर ऑफ मेरिट (यूके)
- 27 बार नोबेल नामांकन
- 1938: ब्रिटिश अकादमी फेलो
- 1961: जर्मन शांति पुरस्कार
- 1968: साहित्य अकादमी फैलोशिप
- 1975: टेम्पलटन पुरस्कार
सर्वेपल्ली राधा कृष्णन की साहित्यिक रचनाएँ!
- 1918: रवींद्रनाथ टैगोर का दर्शनशास्त्र
- 1923: भारतीय दर्शन
- 1926: द हिंदू व्यू ऑफ लाइफ
- 1929: एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ लाइफ
- 1929: कल्कि या सभ्यता का भविष्य
- 1939: पूर्वी धर्म और पश्चिमी विचार
- 1947: धर्म और समाज
- 1948: भगवद्गीता
- 1950: धम्मपद
- 1953: प्रधान उपनिषद
- 1956: रिकवरी ऑफ फेथ
- 1957: ए सोर्स बुक इन इंडियन फिलॉसफी
- 1959: ब्रह्म सूत्र
- 1968: धर्म, विज्ञान और संस्कृति
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की विरासत
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की विरासत आज भी भारत और विश्व में जीवंत है। एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद और राजनेता के रूप में उन्होंने भारतीय दर्शन को पश्चिमी जगत से जोड़ने का अद्भुत कार्य किया। उन्होंने अद्वैत वेदांत की पुनर्व्याख्या की और तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन के माध्यम से पूर्व-पश्चिम के विचारों का समन्वय स्थापित किया। उनके कार्यों ने धार्मिक बहुलवाद, नैतिक शिक्षा और मानवतावाद को मजबूत आधार दिया।
शिक्षा के क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी विरासत शिक्षक दिवस (5 सितंबर) है, जो उनके जन्मदिन पर मनाया जाता है। उन्होंने कहा था कि शिक्षक देश के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क होने चाहिए और शिक्षा चरित्र निर्माण का साधन है। इस परंपरा से लाखों शिक्षक और छात्र प्रेरित होते हैं।
राजनीतिक जीवन में भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, सांस्कृतिक नैतिकता और शांति की वकालत की। सोवियत संघ में राजदूत रहते हुए भी उन्होंने भारतीय संस्कृति की गरिमा बनाए रखी। भारत रत्न (1954) सहित कई सम्मानों से नवाजे गए, उनकी पुस्तकें जैसे “भारतीय दर्शन” और “एन आइडियलिस्ट व्यू ऑफ लाइफ” आज भी अध्ययन का विषय हैं।
उनकी विरासत ज्ञान, सादगी, सहिष्णुता और शिक्षा की शक्ति में निहित है, जो पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है। उनका जीवन सत्य और सेवा का प्रतीक है।
निष्कर्ष: Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन ज्ञान, नैतिकता और सेवा का अद्भुत संगम था। एक साधारण परिवार से उठकर उन्होंने शिक्षक, दार्शनिक, राजनयिक, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के रूप में देश की गरिमा बढ़ाई। उन्होंने भारतीय दर्शन को विश्व मंच पर स्थापित किया और शिक्षा को समाज परिवर्तन का सशक्त माध्यम बताया। उनके विचार धार्मिक सहिष्णुता, नैतिक मूल्यों और विश्व शांति पर आधारित थे। 5 सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस उनके शिक्षकीय आदर्शों का प्रतीक है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता पद में नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों में निहित होती है।