कविता, क्रांति और करुणा की मिसाल: सरोजिनी नायडू का जीवन परिचय! | Sarojini Naidu Jeevan Parichay | Sarojini Naidu Jeevani
Biography of Sarojini Naidu सिर्फ एक जीवन कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसी यात्रा है जिसमें शब्दों की शक्ति, देशभक्ति की अग्नि और नेतृत्व का अद्वितीय संगम है। सरोजिनी नायडू केवल एक कवयित्री नहीं थीं, बल्कि वे वो आवाज़ थीं जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। उन्हें “भारत की कोकिला” कहा गया, लेकिन उनका स्वर केवल गीतों तक सीमित नहीं रहा—वह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एक गर्जना बन गया। क्या आपने कभी सोचा है कि कैसे एक नाजुक-सी कवयित्री राजनीति की कठोर दुनिया में सबसे बुलंद नेता बन गई? क्या उनकी कविताएं केवल कला थीं, या उनमें छुपे थे क्रांति के बीज? इस ब्लॉग में हम जानेंगे सरोजिनी नायडू की प्रेरणादायक जीवनी, उनके साहित्यिक और राजनीतिक योगदानों की गहराई, और यह भी कि आज भी वे क्यों एक मिसाल बनी हुई हैं।
प्रारंभिक जीवन और परिवार
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता, अघोरनाथ चट्टोपाध्याय, एक विद्वान व्यक्ति थे, जिन्होंने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी। वह हैदराबाद के निज़ाम कॉलेज के प्रिंसिपल थे और समाज में उनका काफी सम्मान था। उनकी माँ, बरदा सुंदरी देवी, एक कवयित्री थीं, जो बंगाली में कविताएँ लिखती थीं। सरोजिनी आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनके भाई वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय एक क्रांतिकारी थे, जबकि उनके छोटे भाई हरिंद्रनाथ एक कवि, नाटककार और अभिनेता थे।
बचपन से ही सरोजिनी की रुचि साहित्य और लेखन में थी। उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में फारसी में एक नाटक “माहेर मुनीर” लिखा, जिसने हैदराबाद के निज़ाम को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने सरोजिनी को विदेश में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। यह नाटक न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रशंसित हुआ।
सरोजिनी नायडू की शिक्षा!
सरोजिनी नायडू की शिक्षा हैदराबाद, मद्रास, लंदन और कैम्ब्रिज में हुई। उन्होंने 1891 में, केवल 12 वर्ष की आयु में, मैट्रिकुलेशन परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इसके बाद, 1895 से 1898 तक, उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम की छात्रवृत्ति के सहयोग से इंग्लैंड के किंग्स कॉलेज, लंदन और गिर्टन कॉलेज, कैम्ब्रिज में अध्ययन किया। इंग्लैंड में उनकी मुलाकात सौंदर्यवादी और अवनति आंदोलन के कलाकारों से हुई, जिन्होंने उनकी लेखन शैली को और निखारा।
लंदन में पढ़ाई के दौरान, प्रख्यात साहित्यकारों जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता आर्थर साइमन्स और एडमंड गोसे ने उन्हें सलाह दी कि वह अपनी कविताओं में भारतीय विषयों और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करें। इस सलाह ने उनकी लेखन शैली को एक नई दिशा दी, और उन्होंने भारतीय जीवन, परंपराओं और घटनाओं को अपनी कविताओं का आधार बनाया।
सरोजिनी नायडू का व्यक्तिगत जीवन और विवाह!
1898 में सरोजिनी हैदराबाद लौट आईं और उसी वर्ष उन्होंने डॉ. गोविंदराजुलु नायडू से विवाह किया। गोविंदराजुलु आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम से थे और एक गैर-ब्राह्मण परिवार से संबंध रखते थे। उस समय अंतरजातीय विवाह को समाज में अस्वीकार्य माना जाता था, लेकिन सरोजिनी और गोविंदराजुलु के परिवारों ने इस विवाह को स्वीकार किया। यह विवाह “अभूतपूर्व और निंदनीय” माना गया, लेकिन यह एक लंबा और सामंजस्यपूर्ण रिश्ता साबित हुआ। दंपति के पांच बच्चे हुए: जयसूर्या, पद्मजा, रणधीर, लीलामन और एक अन्य। उनकी बेटी पद्मजा नायडू भी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहीं और स्वतंत्र भारत में कई सरकारी पदों पर कार्य किया।
उपलब्धियां और सम्मान: सरोजिनी नायडू | Achievements and Honors: Sarojini Naidu | Sarojini Naidu Awards
सरोजिनी नायडू एक ऐसी शख्सियत थीं जिन्होंने साहित्य, राजनीति, और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में अपनी असाधारण प्रतिभा और समर्पण से दुनिया भर में पहचान बनाई। उनकी उपलब्धियाँ केवल कविता लेखन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, महिला सशक्तिकरण, और सामाजिक कार्यों में भी अभूतपूर्व योगदान दिया। उनकी उपलब्धियों और सम्मानों ने उन्हें “भारत की कोकिला” के रूप में अमर कर दिया। आइए, उनकी प्रमुख उपलब्धियों और सम्मानों पर विस्तार से नज़र डालें:
साहित्य में उपलब्धियाँ
सरोजिनी नायडू की कविताएँ उनकी संवेदनशीलता, गीतात्मकता, और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरे प्रेम का प्रतीक हैं। उनकी रचनाओं ने न केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति प्राप्त की। उनकी साहित्यिक उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
- “गोल्डन थ्रेशोल्ड” (1905): यह उनकी पहली कविता संग्रह थी, जिसे लंदन में प्रकाशित किया गया। इस संग्रह में उनकी किशोरावस्था की कविताएँ शामिल थीं, जो भारतीय जीवन, परंपराओं, और प्रकृति की सुंदरता को दर्शाती थीं। इसकी प्रस्तुति प्रख्यात साहित्यकार आर्थर साइमन्स ने लिखी थी, और इसे व्यापक प्रशंसा मिली।
- “द बर्ड ऑफ टाइम” (1912): इस संग्रह में उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता “इन द बाज़ार्स ऑफ हैदराबाद” शामिल है। इस कविता में हैदराबाद के बाजारों की जीवंतता, रंग, और सांस्कृतिक समृद्धि का चित्रण है। यह कविता आज भी स्कूलों में पढ़ाई जाती है और इसे उनकी सबसे लोकप्रिय रचना माना जाता है। यह संग्रह लंदन और न्यूयॉर्क में प्रकाशित हुआ, जिसने उनकी वैश्विक पहचान को और मजबूत किया।
- “द ब्रोकन विंग” (1917): इस संग्रह में उनकी देशभक्ति और सामाजिक मुद्दों पर आधारित कविताएँ शामिल थीं। विशेष रूप से, “द गिफ्ट ऑफ इंडिया” कविता ने प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों के बलिदान को श्रद्धांजलि दी। इस कविता को उन्होंने 1915 में हैदराबाद लेडीज वॉर रिलीफ एसोसिएशन के सामने पढ़ा था।
- “द फेदर ऑफ द डॉन” (1961): उनकी मृत्यु के बाद, उनकी अप्रकाशित कविताओं को उनकी बेटी पद्मजा नायडू ने संपादित कर इस संग्रह के रूप में प्रकाशित किया। यह संग्रह उनकी साहित्यिक विरासत का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- निबंध और भाषण: कविता के अलावा, सरोजिनी ने “वर्ड्स ऑफ फ्रीडम” जैसे निबंध और लेख लिखे, जिनमें उन्होंने महिला सशक्तिकरण, स्वतंत्रता, और सामाजिक सुधार जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। उनके भाषणों को 1918 में “स्पीचेज एंड राइटिंग्स ऑफ सरोजिनी नायडू” के रूप में प्रकाशित किया गया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ।
- “माहेर मुनीर”: मात्र 12 वर्ष की आयु में लिखा गया उनका फारसी नाटक “माहेर मुनीर” उनकी प्रारंभिक साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण है। इस नाटक ने हैदराबाद के निज़ाम को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उन्हें विदेश में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की।
सरोजिनी की कविताएँ अंग्रेजी में लिखी गई थीं और ब्रिटिश रोमांटिकतावाद की शैली में थीं, लेकिन उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति और देशभक्ति की भावना स्पष्ट रूप से झलकती थी। उनकी कविताओं में समृद्ध संवेदी चित्रण और भारतीय जीवन का भव्य चित्रण था, जिसने उन्हें “भारतीय येट्स” की उपाधि दिलाई। प्रख्यात साहित्यकार एडमंड गोसे ने 1919 में उन्हें “भारत की सबसे निपुण जीवित कवयित्री” कहा था।
राजनीति में उपलब्धियाँ
सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राजनीति में कई ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कीं। उनकी राजनीतिक उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष (1925): सरोजिनी नायडू 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं, जो उस समय एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। यह उनकी नेतृत्व क्षमता और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान का प्रमाण था। उनकी अध्यक्षता ने महिलाओं को राजनीति में आगे आने के लिए प्रेरित किया।
- स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल (1947-1949): भारत की स्वतंत्रता के बाद, सरोजिनी को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की पहली महिला राज्यपाल नियुक्त किया गया। वह 1947 से 1949 तक इस पद पर रहीं और इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक और सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह भारत में किसी भी राज्य की पहली महिला राज्यपाल बनने का गौरव था।
- स्वतंत्रता संग्राम में नेतृत्व: सरोजिनी ने असहयोग आंदोलन, दांडी नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1930 में धरासना सत्याग्रह के दौरान उन्होंने नेतृत्व किया, जब गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया था। उनकी साहसिक भागीदारी ने स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया।
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व: सरोजिनी ने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, और दक्षिण अफ्रीका में भारतीय स्वतंत्रता और गांधीवादी आदर्शों का प्रचार किया। 1931 में वह गांधीजी के साथ लंदन में गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुईं। 1924 में वह पूर्वी अफ्रीकी भारतीय कांग्रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली दो नेताओं में से एक थीं।
- जेल यात्राएँ: स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें 1930, 1932, और 1942 में जेल की सजा काटनी पड़ी। विशेष रूप से, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें 21 महीने की कैद हुई। उनकी यह निष्ठा और बलिदान स्वतंत्रता संग्राम में उनके समर्पण का प्रतीक है।
सामाजिक कार्यों में उपलब्धियाँ
सरोजिनी नायडू ने सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनके सामाजिक कार्यों की प्रमुख उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
- महिला भारतीय संघ की स्थापना (1917): सरोजिनी ने एनी बेसेंट और अन्य के साथ मिलकर महिला भारतीय संघ (WIA) की स्थापना की। यह संगठन महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का मंच प्रदान करता था। इसने महिलाओं को संगठित करने और उनके राजनीतिक जागरूकता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- महिलाओं के मताधिकार की वकालत: सरोजिनी ने महिलाओं के मताधिकार के लिए लगातार संघर्ष किया। 1918 में उन्होंने बॉम्बे प्रांतीय सम्मेलन में महिलाओं के वोटिंग अधिकारों के लिए प्रस्ताव पेश किया। 1919 में वह लंदन में संसद की संयुक्त चयन समिति के सामने महिलाओं के मताधिकार की वकालत करने गईं। हालाँकि, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों में उनकी माँगें पूरी नहीं हुईं, लेकिन उनके प्रयासों ने भविष्य में प्रांतीय परिषदों द्वारा महिलाओं को मताधिकार देने का मार्ग प्रशस्त किया।
- महिला शिक्षा और सशक्तिकरण: सरोजिनी ने 1906 में कलकत्ता में भारतीय सामाजिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए महिला शिक्षा और सशक्तिकरण पर बल दिया। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है और बिना उनकी सक्रिय भागीदारी के स्वतंत्रता आंदोलन अधूरा रहेगा।
- सामाजिक कल्याण: 1904 से ही सरोजिनी एक प्रभावशाली वक्ता के रूप में उभरीं, जो सामाजिक कल्याण, महिला अधिकार, और राष्ट्रवाद पर भाषण देती थीं। उनके सामाजिक कार्यों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया।
सम्मान और मान्यताएँ
सरोजिनी नायडू को उनके साहित्यिक, राजनीतिक, और सामाजिक योगदानों के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए। उनके कुछ प्रमुख सम्मान इस प्रकार हैं:
- कैसर-ए-हिंद पदक (1911): उनके सामाजिक कार्यों, विशेष रूप से बाढ़ राहत के लिए किए गए प्रयासों के लिए, उन्हें 1911 में ब्रिटिश सरकार द्वारा कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया गया। हालाँकि, 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने यह पदक लौटा दिया, जो उनके साहस और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा को दर्शाता है।
- “भारत की कोकिला”: उनकी कविताओं की गीतात्मकता, रंग, और कल्पनाशीलता के लिए महात्मा गांधी ने उन्हें “भारत की कोकिला” की उपाधि दी। यह उपाधि उनकी साहित्यिक प्रतिभा का सर्वोच्च सम्मान थी।
- “भारतीय येट्स”: उनकी कविताओं की तुलना आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. येट्स से की गई, और उन्हें “भारतीय येट्स” कहा गया। यह उनकी काव्यात्मक शैली और वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है।
- एडमंड गोसे का प्रशंसा पत्र: 1919 में प्रख्यात साहित्यकार एडमंड गोसे ने उन्हें “भारत की सबसे निपुण जीवित कवयित्री” कहा, जो उनकी साहित्यिक प्रतिभा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान था।
- संस्थानों का नामकरण: सरोजिनी के सम्मान में कई संस्थानों का नामकरण किया गया, जैसे:
- सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज, आगरा
- सरोजिनी नायडू महिला कॉलेज
- सरोजिनी नायडू कला एवं संचार स्कूल, हैदराबाद विश्वविद्यालय
- सरोजिनी देवी नेत्र चिकित्सालय
- क्षुद्रग्रह का नामकरण: 1990 में पालोमर वेधशाला में खोजे गए क्षुद्रग्रह 5647 का नाम “सरोजिनिनायडू” उनके सम्मान में रखा गया। इसका आधिकारिक नामकरण माइनर प्लैनेट सेंटर द्वारा 27 अगस्त 2019 को प्रकाशित किया गया।
- गूगल डूडल: 2014 में गूगल इंडिया ने उनकी 135वीं जयंती पर एक विशेष डूडल समर्पित किया, जो उनकी वैश्विक पहचान का प्रतीक था।
- महिला दिवस: सरोजिनी का जन्मदिन, 13 फरवरी, भारत में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो महिलाओं की शक्ति और योगदान को सम्मानित करता है।
Biography of Sarojini Naidu: सरोजिनी नायडू की मृत्यु! Sarojini Naidu Death
2 मार्च 1949 को लखनऊ के सरकारी आवास पर हृदयाघात के कारण सरोजिनी नायडू का निधन हो गया। उनकी मृत्यु से पहले, उनकी तबीयत काफी खराब थी, और डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी थी। 1 मार्च की रात को उन्हें गंभीर सिरदर्द और खांसी का दौरा पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी नर्स से गाना गाने को कहा, जिसके बाद वह सो गईं और फिर उनकी मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार गोमती नदी के किनारे किया गया।
Biography of Sarojini Naidu: सरोजिनी नायडू की विरासत
सरोजिनी नायडू की विरासत आज भी जीवित है। उनकी कविताएँ और भाषण भारतीय साहित्य और इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके जन्मदिन, 13 फरवरी, को भारत में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो महिलाओं की शक्ति और योगदान को सम्मानित करता है।
उनके सम्मान में कई संस्थानों का नामकरण किया गया है, जैसे:
- सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज, आगरा
- सरोजिनी नायडू महिला कॉलेज
- सरोजिनी नायडू कला एवं संचार स्कूल, हैदराबाद विश्वविद्यालय
- सरोजिनी देवी नेत्र चिकित्सालय
1990 में खोजे गए क्षुद्रग्रह 5647 का नाम “सरोजिनिनायडू” उनके सम्मान में रखा गया। 2014 में गूगल इंडिया ने उनकी 135वीं जयंती पर एक डूडल समर्पित किया। उनकी जीवनी और वृत्तचित्र, जैसे “सरोजिनी नायडू – द नाइटिंगेल ऑफ इंडिया,” उनके जीवन को और अधिक प्रेरणादायक बनाते हैं।
Biography of Sarojini Naidu: महत्वपूर्ण तथ्य!
- उन्होंने 12 साल की उम्र में ही साहित्यिक करियर शुरू कर दिया था। उन्होंने “माहेर मुनीर” नामक नाटक लिखा था, जिसे दुनिया भर से प्रशंसा और मान्यता मिली। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा जल्दी शुरू की, कैम्ब्रिज और लंदन में पढ़ाई की। यह नाटक काफी मशहूर हुआ और हैदराबाद के नवाब को बहुत प्रभावित किया।
- हैदराबाद के निज़ाम ने उन्हें 16 साल की उम्र में छात्रवृत्ति दी, जिससे उन्हें लंदन किंग्स कॉलेज में पढ़ने की अनुमति मिली। नोबेल पुरस्कार विजेता आर्थर साइमन और एडमंड गॉस ने उन्हें वहां लेखन संबंधी सलाह दी, जिसमें उन्होंने सुझाव दिया कि उन्हें भारतीय विषयों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने अपनी कविताओं में समकालीन भारतीय जीवन और घटनाओं को उजागर किया। अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए कविता का उपयोग करके उन्होंने निस्संदेह 20वीं सदी की एक कवि के रूप में उत्कृष्टता हासिल की।
- लंदन में कॉलेज में पढ़ाई के दौरान, उन्हें गैर-ब्राह्मण डॉक्टर पदिपति गोविंदराजुलु नायडू से प्यार हो गया। वह इतनी ईमानदार और साहसी थी कि उसने 1898 में अपने प्यार से शादी कर ली, जब वह सिर्फ 19 साल की थी। जयसूर्या, पद्मजा, रणधीर और लीलामन उनके चार बच्चे थे।
- वह 1905 में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुईं, जो उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत थी। उन्होंने 1915 और 1918 के बीच सामाजिक कल्याण, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रवाद पर व्याख्यान देने के लिए भारत में कई स्थानों का दौरा किया। उन्होंने 1917 में महिला भारतीय संघ (WIA) की स्थापना की।
- उनकी कविताओं का पहला संग्रह द गोल्डन थ्रेशोल्ड 1905 में प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा, सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू का दूसरा कविता संग्रह “द फेदर ऑफ द डॉन” 1961 में प्रकाशित हुआ था।
सरोजिनी नायडू 1947 से 1949 तक संयुक्त प्रांत आगरा और अवध की राज्यपाल थीं, जिससे वे देश की पहली महिला राज्यपाल बनीं। - भारत की सबसे प्रमुख हस्ती सरोजिनी नायडू को कई संस्थानों की स्थापना का श्रेय दिया जाता है, जिनमें सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज, सरोजिनी नायडू महिला कॉलेज, सरोजिनी नायडू कला एवं संचार स्कूल तथा सरोजिनी देवी नेत्र चिकित्सालय शामिल हैं।
- 2 मार्च 1949 को लखनऊ के गवर्नमेंट हाउस में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। वह देश की सबसे प्रबल समर्थक थीं और उन्होंने भारत को ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए उनकी सभी विचारधाराओं का समर्थन किया था। महात्मा गांधी ने उन्हें “मिकी माउस” कहा था।
निष्कर्ष: Biography of Sarojini Naidu
सरोजिनी नायडू का जीवन एक प्रेरणा स्रोत है। वे एक साहसी महिला, कवयित्री, और राष्ट्रभक्त थीं, जिन्होंने साहित्य और राजनीति दोनों में अद्वितीय योगदान दिया। उनकी कविताएं आज भी पढ़ने वालों के दिलों को छूती हैं और उनके विचार समाज को दिशा देने का काम करते हैं।
“हमें उद्देश्य की गहराई, भाषण में साहस और कर्म में ईमानदारी चाहिए।”
– सरोजिनी नायडू
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