“जय हिन्द” की शुरुआत: आज़ाद हिन्द फ़ौज की अनकही कहानी! | Azad Hind Fauj Foundation Day | INA Day | Netaji Bose army | INA Day India
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि साहस और बलिदान की जीवंत गाथा है। Azad Hind Fauj Foundation Day हमें उस दौर में ले जाता है, जब एक आवाज़ “दिल्ली चलो” ने पूरे देश में क्रांति की लहर जगा दी थी। यह कहानी है उस सेना की, जिसने सीमाओं के पार रहकर भी भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष किया। क्या आप जानते हैं कि कैसे हजारों भारतीयों ने अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर इतिहास रच दिया? आइए, इस प्रेरणादायक यात्रा को करीब से जानें।
आज़ाद हिन्द फौज (INA) क्या थी? – परिचय
आज़ाद हिन्द फौज, जिसे Indian National Army या INA भी कहते हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में ब्रिटिश शासन का सामना करने के उद्देश्य से गठित एक सैन्य बल था। इसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सरल शब्दों में समझें तो यह वह सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को आज़ादी दिलाने के लिए बनी थी। यह सेना विदेश में बनी थी, लेकिन इसका सपना था भारत को स्वतंत्र देखना।
इस फौज का गठन मूल रूप से 1942 में कैप्टन मोहन सिंह द्वारा सिंगापुर में किया गया था। बाद में 4 जुलाई 1943 को Subhash Chandra Bose ने इसकी कमान संभाली। फिर 21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने इसे पुनर्गठित करके ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ के अंतर्गत भारत की स्वतंत्र सेना के रूप में स्थापित किया। यही वजह है कि 21 अक्टूबर को आज़ाद हिन्द फ़ौज के स्थापना दिवस मनाया जाता है।
आज़ाद हिन्द फौज का गठन पहली बार 1942 में हुआ था। मूल रूप से उस वक्त यह आज़ाद हिन्द सरकार की सेना थी जिसका लक्ष्य अंग्रेजों से लड़कर भारत को स्वतंत्रता दिलाना था। जब दक्षिण-पूर्वी एशिया में जापान के सहयोग द्वारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने करीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया और उसे भी आज़ाद हिन्द फौज नाम दिया तो उन्हें आज़ाद हिन्द फौज का सर्वोच्च कमांडर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी गई। इस तरह यह सेना भारत की आज़ादी के लिए तैयार हुई।
यह सेना सिर्फ पुरुषों की नहीं थी। इसमें महिलाएं भी शामिल थीं। इसका मतलब है कि स्वतंत्रता का संघर्ष हर भारतीय का था – चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इस फौज ने दिखाया कि देशभक्ति में लिंग की कोई सीमा नहीं होती। अब हम इसके गठन की पूरी कहानी विस्तार से समझते हैं।
गठन – कैसे बनी आज़ाद हिन्द फौज
गठन की शुरुआत मोहन सिंह से हुई। उन्होंने भारतीय युद्धबंदियों (POW) से एक सेना गठित करने का प्रस्ताव किया और जापानी समर्थन प्राप्त किया। उन्होंने शुरुआत में INA का नेतृत्व किया, जिसमें लगभग 40,000 सैनिकों की भर्ती की गई। हालाँकि सैनिकों की संख्या को लेकर जापानियों के साथ संघर्ष के कारण उन्हें हटा दिया गया।
इसके बाद रासबिहारी बोस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक अनुभवी क्रांतिकारी थे। इन्होंने INA के लिए समर्थन जुटाने में बहुत काम किया और टोक्यो में भारतीय स्वतंत्रता लीग का गठन किया (1942)। उन्होंने विदेशों में भारतीयों को एकजुट किया।
फिर सुभाष चंद्र बोस का दौर आया। 25 अगस्त 1943 को बोस को INA का सुप्रीम कमांडर नियुक्त किया गया। बाद में 21 अक्टूबर 1943 को उन्होंने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अनंतिम सरकार यानी आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की। इसे जापान, जर्मनी, इटली और चीन (वांग जिंगवेई के नेतृत्व में) सहित 9 देशों द्वारा मान्यता दी गई।
इन तीनों नेताओं – मोहन सिंह, रासबिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस – ने मिलकर इस फौज को मजबूत बनाया। हर नेता का अपना योगदान था। मोहन सिंह ने शुरुआत की, रासबिहारी बोस ने समर्थन जुटाया और नेताजी बोस ने इसे नई ऊंचाई दी। इस तरह गठन की प्रक्रिया पूरी हुई।
आज़ाद हिन्द फौज का इतिहास – Azad Hind Fauj Foundation Day
द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत से पहले जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया निर्वासित भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए महत्वपूर्ण आश्रय स्थल थे। उसी समय जापान ने मलायी सुल्तानों, विदेशी चीनी समुदाय, बर्मी प्रतिरोध और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से समर्थन प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से मेजर इवाइची फुजिवारा के नेतृत्व में दक्षिण एशिया में खुफिया मिशन भेजे।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में जापान की सहायता से टोकियो में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिए आज़ाद हिन्द फौज या इंडियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया। इस सेना के गठन में कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस एवं निरंजन सिंह गिल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना का विचार सर्वप्रथम मोहन सिंह के मन में आया था।
इसी बीच विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की गई जिसका प्रथम सम्मेलन जून 1942 ई. को बैंकाक में हुआ। आरंभ में इस फौज में जापान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों को लिया गया था। बाद में इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती हो गए। आरंभ में इस सेना में लगभग 16,300 सैनिक थे।
- कालांतर में जापान ने 60,000 युद्ध बंदियों को आज़ाद हिन्द फौज में शामिल होने के लिए छोड़ दिया। पर इसके बाद ही जापानी सरकार और मोहन सिंह के अधीन भारतीय सैनिकों के बीच आज़ाद हिन्द फौज की भूमिका के संबंध में विवाद उत्पन्न हो जाने के कारण मोहन सिंह एवं निरंजन सिंह गिल को गिरफ्तार कर लिया गया।
- आज़ाद हिन्द फौज का दूसरा चरण तब प्रारंभ होता है जब सुभाषचंद्र बोस सिंगापुर गए। सुभाषचंद्र बोस ने 1941 ई. में बर्लिन में इंडियन लीग की स्थापना की किंतु जर्मनी ने उन्हें रूस के विरुद्ध प्रयुक्त करने का प्रयास किया तब उनके सामने कठिनाई उत्पन्न हो गई और उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया जाने का निश्चय किया।
- एक वर्ष बाद सुभाष चंद्र बोस पनडुब्बी द्वारा जर्मनी से जापानी नियंत्रण वाले सिंगापुर पहुंचे और पहुंचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिए स्वयं संघर्ष करना होगा।
- इससे प्रफुल्लित होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को आज़ाद हिन्द फौज का नेतृत्व सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने सुप्रीम कमांडर के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ने सेना को संबोधित करते हुए “दिल्ली चलो!” का नारा दिया।
- जापानी सेना के साथ मिलकर बर्मा सहित आज़ाद हिन्द फौज रंगून (यांगून) से होती हुई थलमार्ग से भारत की ओर बढ़ती हुई 18 मार्च सन 1944 ई. को कोहिमा और इम्फाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुंच गई और ब्रिटिश व कॉमनवेल्थ सेना से जमकर मोर्चा लिया।
- बोस ने अपने अनुयायियों को “जय हिन्द” का अमर नारा दिया और 21 अक्टूबर 1943 में सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की। उनके अनुयायी प्रेम से उन्हें नेताजी कहते थे।
- अपने इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष तीनों का पद नेताजी ने अकेले संभाला। इसके साथ ही अन्य जिम्मेदारियां जैसे वित्त विभाग एस.सी. चटर्जी को, प्रचार विभाग एस.ए. अय्यर को तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया।
- इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मकाऊ और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिए। नेताजी उन द्वीपों में गए और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसंबर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतंत्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया।
- इसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर एवं रंगून में आज़ाद हिन्द फौज का मुख्यालय बनाया। 4 फरवरी 1944 को आज़ाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।
- 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ट की और आज़ाद हिन्द फौज द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिए उनकी शुभकामनाएं मांगीं: “मैं जानता हूं कि ब्रिटिश सरकार भारत की स्वाधीनता की मांग कभी स्वीकार नहीं करेगी। मैं इस बात का कायल हो चुका हूं कि यदि हमें आजादी चाहिए तो हमें खून के दरिया से गुजरने को तैयार रहना चाहिए। अगर मुझे उम्मीद होती कि आजादी पाने का एक और सुनहरा मौका अपनी जिंदगी में हमें मिलेगा तो मैं शायद घर छोड़ता ही नहीं। मैंने जो कुछ किया है, अपने देश के लिए किया है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और भारत की स्वाधीनता के लक्ष्य के निकट पहुंचने के लिए किया है। भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है। आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक भारत की भूमि पर सफलतापूर्वक लड़ रहे हैं। हे राष्ट्रपिता! भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं।”
- सुभाषचंद्र बोस द्वारा ही गांधी जी के लिए प्रथम बार “राष्ट्रपिता” शब्द का प्रयोग किया गया था। इसके अतिरिक्त सुभाष चंद्र बोस ने फौज के कई ब्रिगेड बनाकर उन्हें नाम दिए: महात्मा गांधी ब्रिगेड, अबुल कलाम आज़ाद ब्रिगेड, जवाहरलाल नेहरू ब्रिगेड तथा सुभाषचंद्र बोस ब्रिगेड। सुभाषचंद्र बोस ब्रिगेड के सेनापति शाहनवाज खां थे।
21 मार्च 1944 को “दिल्ली चलो” के नारे के साथ आज़ाद हिन्द फौज की हिन्दुस्तान की धरती पर आगमन हुआ। 22 सितंबर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुए सुभाषचंद्र बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा: “हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। यह स्वतंत्रता की देवी की मांग है।”
फरवरी से लेकर जून 1944 ई. के मध्य तक आज़ाद हिन्द फौज की तीन ब्रिगेडों ने जापानियों के साथ मिलकर भारत की पूर्वी सीमा एवं बर्मा से युद्ध लड़ा किंतु दुर्भाग्यवश द्वितीय विश्व युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े। ऐसे में नेताजी को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया किंतु इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है।
आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक एवं अधिकारियों को अंग्रेजों ने 1945 ई. उन्होंने गिरफ्तार कर लिया और उनका सैनिक अभियान असफल हो गया, किंतु इस असफलता में भी उनकी जीत छिपी थी।
नेताजी का संदेश और विचार
नेताजी ने अपने सैनिकों से कहा:
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
उन्होंने महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया और स्वतंत्रता संग्राम में उनके आशीर्वाद की कामना की।
पतन, INA पर अभियोग और राष्ट्रवादी प्रदर्शन
जापान की हार (1944-45) से INA कमजोर हो गई। 15 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण के बाद INA ने भी आत्मसमर्पण कर दिया। 18 अगस्त 1945 को कथित तौर पर ताइवान विमान दुर्घटना में सुभाष बोस की मृत्यु हो गई जिसके कारण INA को भंग कर दिया गया।
INA पर अभियोग: INA की हार के बाद अनेक INA सैनिकों को युद्धबंदियों के रूप में कोर्ट मार्शल किया गया जिससे देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को बढ़ावा दिया।
नवंबर 1945 में लाल किले में हुए पहले मुकदमे में तीन अधिकारी प्रेम कुमार सहगल (एक हिंदू), शाह नवाज खान (एक मुस्लिम) और गुरबख्श सिंह ढिल्लों (एक सिख) शामिल थे जिन्होंने INA की एकता पर जोर दिया।
बॉम्बे कांग्रेस अधिवेशन (सितंबर 1945) में INA युद्धबंदियों के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया गया। प्रख्यात वकील भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू, जवाहरलाल नेहरू और आसफ अली ने उनका प्रतिवाद किया।
प्रमुख राष्ट्रवादी प्रदर्शन (1945-46): इस अवधि के दौरान तीन प्रमुख हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए:
- 21 नवंबर 1945: INA मुकदमों के खिलाफ कलकत्ता में छात्र विरोध प्रदर्शन के कारण पुलिस गोलीबारी हुई।
- 11 फरवरी 1946: INA अधिकारी राशिद अली की सजा के विरोध में कलकत्ता में प्रदर्शन शुरू हो गए।
- 18 फरवरी 1946: रॉयल इंडियन नेवी (RIN) के सैनिकों ने बॉम्बे में विद्रोह कर दिया।
इन प्रदर्शनों ने पूरे देश को जगा दिया। लोग सड़कों पर उतर आए और नारे लगाए – “लाल किले को तोड़ दो, आज़ाद हिन्द फौज को छोड़ दो।” विवश होकर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने अपनी विशेषाधिकार का प्रयोग कर इनकी मृत्युदंड की सजा माफ कर दी।
महिला दल – रानी झांसी रेजिमेंट
आज़ाद हिन्द फौज के इतिहास में ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ का गठन एक अभूतपूर्व घटना थी। नेताजी सुभाषचंद्र बोस का यह मानना था कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल पुरुषों का दायित्व नहीं बल्कि हर भारतीय स्त्री का भी धर्म है। इसी विचार को साकार करने हेतु उन्होंने सन् 1943 में कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (बाद में लक्ष्मी सहगल) के नेतृत्व में ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ की स्थापना की।
यह विश्व की पहली सर्वथा महिला युद्ध इकाई थी जिसने प्रशिक्षण लेकर युद्धभूमि में भाग लिया। इस रेजिमेंट में लगभग 1,500 महिला सैनिक थीं जिनमें से अधिकांश दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली भारतीय प्रवासी महिलाएं थीं।
इन महिलाओं ने यह सिद्ध किया कि त्याग, साहस और देशभक्ति किसी लिंग की सीमा में नहीं बंधी। वे बंदूकों के साथ मोर्चों पर डटीं, दुश्मनों से लड़ीं और हर क्षण “जय हिन्द” के उद्घोष से वातावरण गुंजायमान कर दिया। कैप्टन लक्ष्मी सहगल स्वयं नेताजी के नेतृत्व में रंगून तक अग्रिम मोर्चे पर पहुंचीं। उन्होंने न केवल सैनिकों का मनोबल बढ़ाया बल्कि घायल सैनिकों की सेवा में भी अग्रणी भूमिका निभाई।
‘रानी झांसी रेजिमेंट’ का नाम सुनते ही ब्रिटिश सेना भी आश्चर्यचकित रह गई क्योंकि यह उस युग का संकेत था जब भारतीय नारी पहली बार बंदूक थामकर देश की स्वतंत्रता की रक्षा में उतरी थी। इन वीरांगनाओं का योगदान आज भी भारतीय सैन्य परंपरा के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जब भारत की मातृभूमि पुकारती है तब उसकी बेटियां भी रणभूमि में कदम रखने से पीछे नहीं हटतीं।
द्रुत प्रयाण गीत – कदम कदम बढ़ाये जा
आज़ाद हिन्द फौज का प्रयाण गीत (क्विक मार्च) था “कदम कदम बढ़ाये जा” जिसकी रचना राम सिंह ठकुरि ने की थी। इस ट्यून का आज भी भारतीय सेना के प्रयाण गीत के रूप में प्रयोग होता है। पूरा गीत इस प्रकार है:
कदम कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा ये जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा
तू शेर-ए-हिन्द आगे बढ़ मरने से तू कभी न डर उड़ा के दुश्मनों का सर जोश-ए-वतन बढ़ाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा ये जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा
हिम्मत तेरी बढ़ती रहे खुदा तेरी सुनता रहे जो सामने तेरे खड़े तू खाक में मिलाये जा
कदम कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा ये जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा
चलो दिल्ली पुकार के ग़म-ए-निशाँ संभाल के लाल किले पे गाड़ के लहराये जा लहराये जा
कदम कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा ये जिंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा
यह गीत सैनिकों को प्रेरणा देता था। हर कदम पर यह उन्हें याद दिलाता था कि वे कौम के लिए लड़ रहे हैं।
आज़ाद हिन्द फौज के तमगे (वरीयता के क्रम में)
आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों को सम्मान के लिए विशेष तमगे दिए गए। वरीयता के क्रम में ये थे:
- शेरे-हिन्द
- सरदारे-जंग
- वीरे-हिन्द
- शहीदे-भारत
ये तमगे बहादुरी के प्रतीक थे। इन्हें पाने वाले सैनिक आज भी गर्व करते हैं।
निष्कर्ष – Azad Hind Fauj Foundation Day
Azad Hind Fauj Foundation Day – हमें याद दिलाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मोहन सिंह, रासबिहारी बोस, लक्ष्मी सहगल और हजारों सैनिकों ने किस तरह खून बहाकर आजादी का सपना देखा। यद्यपि आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों की संख्या के बारे में थोड़े बहुत मतभेद रहे हैं परन्तु ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि इस सेना में लगभग चालीस हजार सेनानी थे। इस संख्या का अनुमोदन ब्रिटिश गुप्तचर रहे कर्नल जीडी एण्डरसन ने भी किया है। जब जापानी लोगों ने सिंगापुर पर कब्जा किया था, तो लगभग 45 हजार भारतीय सेनानियों को पकड़ा गया था।
निस्संदेह सुभाष उग्र राष्ट्रवादी थे। उनके मन में फासीवाद के अधिनायकों के सबल तरीकों के प्रति भावनात्मक झुकाव भी था और वे भारत को शीघ्रातिशीघ्र स्वतंत्रता दिलाने हेतु हिंसात्मक उपायों में आस्था भी रखते थे। इसीलिए उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था।
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