Biography of Raja Ram Mohan Roy: जीवनी, जन्म, कार्य और इतिहास!

Table of Contents

भारतीय पुनर्जागरण के जनक: कौन थे राजा राममोहन राय? जानिए ब्रह्म समाज के संस्थापक के बारे में सब कुछ! | Raja Ram Mohan Roy Jeevan Parichay | Raja Ram Mohan Roy Jeevani

this is the image of father of modern India

क्या आप जानते हैं कि भारतीय समाज में सती प्रथा जैसी कुप्रथा को खत्म करने वाला पहला महानायक कौन था? जी हां, हम बात कर रहे हैं Raja Ram Mohan Roy की — एक ऐसे विचारक, समाज सुधारक और आधुनिक भारत के निर्माता की, जिन्होंने अपने समय से बहुत आगे की सोच रखी। Biography of Raja Ram Mohan Roy न सिर्फ एक जीवन कहानी है, बल्कि यह एक आंदोलन है जिसने भारत के सामाजिक ढांचे को बदल दिया। आइए जानें कि कैसे एक व्यक्ति ने अपने विचारों और संघर्षों से इतिहास रचा और भारतीय समाज को नई दिशा दी।

प्रारंभिक जीवन और परिवार

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गांव में एक समृद्ध बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता, रामकांत रॉय, एक वैष्णव ब्राह्मण थे, जो मुगल प्रशासन में राजस्व संग्रहकर्ता के रूप में कार्यरत थे। उनकी माता, तारिणीदेवी, एक धर्मपरायण महिला थीं, हालांकि उनके बारे में ज्यादा ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। राममोहन राय का परिवार परंपरागत और धार्मिक विचारों से युक्त था, जिसने उनके प्रारंभिक जीवन को प्रभावित किया।

राममोहन राय ने तीन विवाह किए। उनकी पहली पत्नी का कम उम्र में ही निधन हो गया। दूसरी पत्नी से उनके दो बेटे, राधाप्रसाद (1800) और रामप्रसाद (1812) हुए, जिनमें से रामप्रसाद की मृत्यु 1824 में हो गई। उनकी तीसरी पत्नी उनके देहांत के बाद जीवित रहीं।

शिक्षा और बौद्धिक विकास

राममोहन राय की शिक्षा उनके समय के लिए असाधारण थी। उन्होंने अरबी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, लैटिन, ग्रीक, और हिब्रू जैसी कई भाषाओं में प्रवीणता हासिल की। इसके अलावा, उन्होंने हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, जैन धर्म, और सूफी मतों का गहन अध्ययन किया। उनकी यह बौद्धिक जिज्ञासा उन्हें विभिन्न धर्मों की तुलनात्मक समझ प्रदान करती थी, जिसने उनके सुधारवादी विचारों को आकार दिया।

17 वर्ष की आयु में ही राममोहन राय मूर्तिपूजा और धार्मिक कर्मकांडों के खिलाफ हो गए थे। उन्होंने 15 वर्ष की उम्र में मूर्तिपूजा के खिलाफ एक पुस्तिका लिखी, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि मूर्तिपूजा वेदों में नहीं है। इस तरह के क्रांतिकारी विचारों के कारण उन्हें अपने परिवार और समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। कट्टरपंथी विचारों के कारण उन्हें घर छोड़ना पड़ा और देश निकाले की स्थिति में जीवन बिताना पड़ा। लेकिन इस दौरान उन्होंने यात्राएं कीं और तिब्बत, यूरोप, और अन्य स्थानों से ज्ञान अर्जित किया।

धार्मिक सुधार और ब्रह्म समाज की स्थापना

राजा राममोहन राय का सबसे महत्वपूर्ण योगदान धार्मिक और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में था। उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वासों, मूर्तिपूजा, और कर्मकांडों की आलोचना की। वे एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे और मानते थे कि सभी धर्मों का मूल सत्य एक ही है। इस विचार को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने 1814 में आत्मीय सभा और 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की।

ब्रह्म समाज के सिद्धांत

ब्रह्म समाज एक बौद्धिक और सुधारवादी आंदोलन था, जिसके मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित थे:

  • एकेश्वरवाद: एक निराकार, सर्वशक्तिमान, और दयालु ईश्वर की पूजा।
  • वेदों की प्रामाणिकता को अस्वीकार करना: ब्रह्म समाज ने वेदों को सर्वोच्च धार्मिक ग्रंथ नहीं माना।
  • मूर्तिपूजा और कर्मकांडों का विरोध: यह संगठन मूर्तिपूजा, बलिदान, और पुरोहितवाद के खिलाफ था।
  • सभी धर्मों की एकता: ब्रह्म समाज सभी धर्मों के नैतिक और दार्शनिक मूल्यों को स्वीकार करता था।
  • तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह आंदोलन तर्कवाद और आधुनिक विचारों को प्रोत्साहित करता था।

ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज में धार्मिक और सामाजिक सुधारों की नींव रखी। इसने भारतीय राष्ट्रवाद की भावना को भी प्रेरित किया। 1866 में ब्रह्म समाज दो शाखाओं में विभाजित हो गया: आदि ब्रह्म समाज (देबेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में) और भारत का ब्रह्म समाज (केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में)।

सती प्रथा का उन्मूलन

राजा राममोहन राय की सबसे बड़ी उपलब्धि सती प्रथा को समाप्त करना था। सती प्रथा एक क्रूर रिवाज थी, जिसमें पति की मृत्यु के बाद विधवा को उसकी चिता पर जला दिया जाता था। राममोहन राय ने इसे अमानवीय और अनैतिक माना। उन्होंने इसके खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाया, जिसमें समाचार पत्रों, लेखों, और सार्वजनिक सभाओं का उपयोग किया गया।

उनके अथक प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि 1829 में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया। जब कट्टरपंथियों ने इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में इसके खिलाफ याचिका दायर की, तो राममोहन राय ने अपने प्रगतिशील मित्रों के साथ मिलकर इसका विरोध किया। अंततः प्रिवी काउंसिल ने सती प्रथा के समर्थकों की याचिका खारिज कर दी। इस उपलब्धि ने उन्हें विश्व के मानवतावादी सुधारकों की श्रेणी में ला खड़ा किया।

बाल विवाह और महिला सशक्तिकरण

राममोहन राय ने बाल विवाह के खिलाफ भी जोरदार आवाज उठाई। उनका मानना था कि यह प्रथा बच्चों के अधिकारों का हनन करती है और उनकी शिक्षा व विकास में बाधा डालती है। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए। वे विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे और महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार दिलाने की वकालत करते थे।

उनके प्रयासों ने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने समाज को तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिससे सामाजिक कुरीतियों का अंत हुआ।

राजा राममोहन राय के योगदान

1. सती प्रथा का उन्मूलन

राजा राममोहन राय(Raja Ram Mohan Roy in Hindi) सती प्रथा के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था। यह प्रथा उस समय प्रचलित थी जिसमें पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी को पति की चिता पर जलाने की प्रथा थी। राममोहन राय ने इसे अमानवीय और अनैतिक माना। उन्होंने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाला और अंततः 1829 में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया।

2. बाल विवाह का विरोध

बाल विवाह के खिलाफ भी राजा राममोहन राय ने जोरदार आवाज उठाई। उन्होंने इस प्रथा को रोकने के लिए समाज में जागरूकता फैलाई और इसे समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना था कि बाल विवाह न केवल बच्चों के अधिकारों का हनन है, बल्कि यह उनकी शिक्षा और विकास के मार्ग में भी बाधा डालता है।

  • राजा राम मोहन राय ने बाल विवाह को एक अमानवीय और सामाजिक रूप से हानिकारक प्रथा माना।
  • उन्होंने कम उम्र में लड़कियों की शादी को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक शोषण का रूप कहा।
  • उन्होंने समाज में महिलाओं की शिक्षा, स्वतंत्रता और सशक्तिकरण के लिए बाल विवाह के उन्मूलन की आवश्यकता पर बल दिया।
  • बाल विवाह के विरुद्ध उन्होंने जनजागरण, लेखन और सभा-भाषणों के माध्यम से समाज को चेताया।

राजा राम मोहन राय के मुख्य सामाजिक सुधारों में बाल विवाह विरोध:

  • सती प्रथा के खिलाफ आंदोलन
  • विधवा पुनर्विवाह का समर्थन
  • बाल विवाह का विरोध
  • महिलाओं को संपत्ति और शिक्षा का अधिकार दिलाने की पहल
  • अंधविश्वास और जातिवाद का विरोध

3. धार्मिक सुधार | राजा राम मोहन राय द्वारा धार्मिक सुधार

धार्मिक सुधार के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का योगदान भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की, जो एक सुधारवादी आंदोलन था जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म की कुरीतियों को समाप्त करना था। उन्होंने मूर्ति पूजा, अंधविश्वास, और धार्मिक अनुष्ठानों के खिलाफ आवाज उठाई। ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद और सामाजिक समानता की वकालत की।

  • राजा राम मोहन राय का पहला प्रमुख ग्रंथ तुहफ़ात-उल-मुवाहिदीन वर्ष 1803 में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वास, मूर्ति पूजा और सामाजिक कुरीतियों की कड़ी आलोचना की।
  • 1814 में उन्होंने आत्मीय सभा की स्थापना कर मूर्ति पूजा, जातीय भेदभाव और निरर्थक धार्मिक अनुष्ठानों के खिलाफ जनजागरण शुरू किया।
  • उन्होंने ईसाई धर्म के कर्मकांडों की भी आलोचना की और प्रिसेप्टस ऑफ जीसस (1820) नामक ग्रंथ में चमत्कारों से परे बाइबल के नैतिक और दार्शनिक मूल्यों को सामने लाने की कोशिश की।

4. शिक्षा में सुधार | राजा राम मोहन राय के शैक्षिक सुधार

शिक्षा के क्षेत्र में भी राजा राममोहन राय का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने पश्चिमी शिक्षा प्रणाली और विज्ञान आधारित शिक्षा को भारतीय समाज में प्रचलित करने का प्रयास किया। उन्होंने 1817 में हिंदू कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आगे चलकर प्रेसीडेंसी कॉलेज के रूप में विकसित हुआ। उनका मानना था कि शिक्षा समाज को प्रगति की ओर ले जाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है।

राजा राममोहन राय के ये सुधार भारतीय समाज में गहरे और स्थायी प्रभाव छोड़ गए। उनकी विरासत आज भी भारतीय समाज में उनकी दृष्टि और प्रयासों की गूंज के रूप में जीवित है।

  • शिक्षा के क्षेत्र में राजा राम मोहन राय का योगदान ऐतिहासिक रहा है।
    1817 में उन्होंने डेविड हेयर के साथ मिलकर हिंदू कॉलेज की स्थापना का समर्थन किया, जहाँ आधुनिक विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
  • उनके अंग्रेजी स्कूल में मैकेनिक्स और यूरोपीय विचारकों जैसे वोल्टेयर के दर्शन को पढ़ाया गया।
    1825 में उन्होंने वेदांत कॉलेज की स्थापना की, जहाँ भारतीय परंपराओं और पश्चिमी विज्ञान का समावेश किया गया — यह भारत में आधुनिक शिक्षा के समावेश का प्रमुख उदाहरण बना।

5. राजा राम मोहन राय के प्रमुख सामाजिक सुधार

  • राजा राम मोहन राय ने भारत में सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई क्रांतिकारी पहल कीं।
  • उन्होंने 1815 में आत्मीय सभा, 1821 में कलकत्ता यूनिटेरियन एसोसिएशन और 1828 में ब्रह्म सभा (बाद में ब्रह्म समाज) की स्थापना की, जो समाज सुधार के प्रमुख मंच बने।
  • उन्होंने जातिवाद, छुआछूत, अंधविश्वास और नशे की बुरी लत के विरुद्ध जन आंदोलनों का नेतृत्व किया।
  • राजा राम मोहन राय को सती प्रथा उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह के समर्थन, और महिला अधिकारों (जैसे संपत्ति और उत्तराधिकार) की पैरवी के लिए जाना जाता है।
  • उन्होंने बाल विवाह और महिलाओं की शिक्षा की उपेक्षा का भी विरोध किया।

6. ब्रह्म समाज

राजा राम मोहन राय (Raja Ram Mohan Roy in Hindi) ने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। इसका उद्देश्य समाज में सुधार लाना और धार्मिक अंधविश्वासों को समाप्त करना था। ब्रह्म समाज ने तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया और मूर्तिपूजा का विरोध किया।

यह संगठन मूर्ति पूजाकर्मकांडबलिदान, और पुरोहितवाद जैसे धार्मिक पाखंडों का विरोध करता था।

ब्रह्म समाज का फोकस प्रार्थना, ध्यान और शास्त्रों के अध्ययन पर था। इसकी शुरुआत का मुख्य उद्देश्य भारतीय समाज में व्याप्त धार्मिक अंधविश्वासों और सामाजिक बुराइयों को उजागर करना था।

यह भारत का पहला बौद्धिक सामाजिक सुधार आंदोलन बना जिसने तर्कवाद और ज्ञानोदय को प्रोत्साहित किया। इसने न केवल धार्मिक सुधारों को जन्म दिया, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की विचारधारा को भी प्रेरित किया।

ब्रह्म समाज सभी धर्मों की एकता में विश्वास रखता था और इसका संदेश था – एक ईश्वर, एक मानवता

ब्रह्म समाज के मुख्य सिद्धांत क्या थे?

1828 में कलकत्ता में राम मोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्मो समाज के मुख्य सिद्धांत इस प्रकार हैं:

  • यह वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करता है। * इसका अवतारों में कोई विश्वास नहीं है।
  • यह कर्म (पिछले कर्मों के कारण प्रभाव) या संसार (मृत्यु और पुनर्जन्म की प्रक्रिया) में विश्वास पर जोर नहीं देता है।
  • यह हिंदू अनुष्ठानों को त्याग देता है और अपनी पूजा में कुछ ईसाई प्रथाओं को अपनाता है।
  • इस्लाम और ईसाई धर्म से प्रभावित होकर, यह बहुदेववाद, छवि पूजा और जाति व्यवस्था की निंदा करता है।

7. महिला सशक्तिकरण

राजा राम मोहन राय ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी शिक्षा के लिए भी काम किया। वे बाल विवाह के विरोधी थे और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करते थे।

8. अंधविश्वास और कुरीतियों का विरोध

उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और कुरीतियों का कड़ा विरोध किया और समाज को तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया।

9. पत्रकारिता और प्रकाशन

राजा राम मोहन राय(Raja Ram Mohan Roy in Hindi) ने पत्रकारिता और प्रकाशन के माध्यम से अपने विचारों का प्रसार किया। उन्होंने ‘सम्बाद कौमुदी’ नामक बंगाली पत्रिका और ‘मिरात-उल-अखबार’ नामक फारसी अखबार की स्थापना की।

राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधार में राजनीति और आधुनिकीकरण दोनों है।उनकी तात्कालिक समस्या उनके मूल बंगाल की धार्मिक और सामाजिक स्थितियों का था।

राजा राम मोहन राय के आर्थिक और राजनीतिक सुधार

राजा राम मोहन राय केवल एक धार्मिक और सामाजिक सुधारक ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने आर्थिक और राजनीतिक सुधारों की दिशा में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए, जिनका उद्देश्य भारतीय समाज को न्याय, समानता और स्वतंत्रता की ओर ले जाना था।

1. नागरिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष

राम मोहन राय ब्रिटिश संविधान आधारित शासन प्रणाली से प्रभावित थे, जहाँ लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताविचारों की आज़ादी, और न्याय की गारंटी दी जाती थी।
उन्होंने यह महसूस किया कि भारत में भी ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें नागरिकों को उनके मूल अधिकार प्राप्त हों।

2. प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन

राम मोहन राय भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रारंभिक समर्थकों में से एक थे।
1819 में जब लॉर्ड हेस्टिंग्स ने प्रेस सेंसरशिप को शिथिल किया, तब उन्होंने तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया:

  • ब्राह्मणवादी पत्रिका (1821)
  • संवाद कौमुदी – बंगाली साप्ताहिक (1821)
  • मिरात-उल-अकबर – फारसी साप्ताहिक

इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने जन-जागरूकता बढ़ाई, सामाजिक मुद्दों पर विचार रखे और सरकार की नीतियों की आलोचना भी की।

3. कराधान प्रणाली में सुधार की मांग

राम मोहन राय ने बंगाल के ज़मींदारों की शोषणकारी नीतियों की खुलकर आलोचना की।
उन्होंने निम्नलिखित मांगें रखीं:

  • किसानों पर लगने वाले कर को न्यूनतम किया जाए
  • कर-मुक्त भूमि प्रदान की जाए
  • अनावश्यक करों को समाप्त किया जाए
  • भारतीय उत्पादों के निर्यात पर लगने वाले करों को कम किया जाए
  • ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को खत्म किया जाए ताकि व्यापार स्वतंत्र हो सके

4. प्रशासनिक और न्यायिक सुधार

राम मोहन राय ने प्रशासनिक सुधारों की ज़रूरत को महसूस करते हुए यह सुझाव दिया कि:

  • प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाई जाए
  • न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग किया जाए ताकि न्याय प्रणाली निष्पक्ष बन सके
  • भारतीयों और यूरोपीय लोगों के लिए समान अधिकार और अवसर सुनिश्चित किए जाएँ

Biography of Raja Ram Mohan Roy: इंग्लैंड यात्रा और मृत्यु

1831 में राममोहन राय एक विशेष कार्य के लिए इंग्लैंड गए, जहां उन्होंने मुगल सम्राट के पक्ष का समर्थन किया। इस दौरान उन्हें मुगल सम्राट की ओर से “राजा” की उपाधि दी गई। इंग्लैंड में उन्होंने ब्रिटिश संसद के समक्ष भारतीय प्रशासन के सुधारों के लिए सुझाव दिए। वे हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति के समक्ष साक्ष्य देने वाले पहले भारतीय थे।

दुर्भाग्यवश, 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल, इंग्लैंड में मेनिनजाइटिस के कारण उनका निधन हो गया। उस समय ब्रिटेन में दाह-संस्कार की अनुमति नहीं थी, इसलिए उनके शव को आरनोस वेल कब्रिस्तान में दफनाया गया। उनकी समाधि लंबे समय तक उपेक्षित रही, लेकिन कोलकाता के एक व्यवसायी और ब्रिस्टल की एक अंग्रेज महिला, कार्ला कॉन्ट्रैक्टर, के प्रयासों से इसे पुनर्जनन किया गया। आज यह एक भव्य समाधि के रूप में मौजूद है, जहां उनकी स्मृति में एक प्रतिमा भी स्थापित है।

Biography of Raja Ram Mohan Roy:  राष्ट्रीय पुरस्कार

राजा राममोहन राय के सम्मान में भारत सरकार द्वारा राजा राममोहन राय राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की गई। यह पुरस्कार समाज सेवा, शिक्षा, और सांस्कृतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को दिया जाता है। इसमें 1 लाख रुपये की नकद राशि, एक प्रशस्ति पत्र, और एक पदक शामिल होता है।

गूगल डूडल की और से श्रद्धांजलि

22 मई, 2018 को गूगल ने राजा राममोहन राय के 246वें जन्मदिन पर एक डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस डूडल को टोरंटो की डिजाइनर बीना मिस्त्री ने बनाया, जिसमें राममोहन राय को एक किताब पकड़े हुए और उनके आसपास लोगों के साथ दिखाया गया। यह उनके समाज सुधार के योगदान को दर्शाता है।

राम मोहन राय ने भारतीय समाज के आधुनिकीकरण में किस प्रकार का योगदान दिया?

1772 में बंगाल में जन्मे राम मोहन राय को भारत में एक सामाजिक, धार्मिक और शैक्षिक सुधारक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने पारंपरिक हिंदू संस्कृति को चुनौती दी और ब्रिटिश शासन के तहत भारतीय समाज की प्रगति के लिए रास्ते बताए। उन्हें आधुनिक भारत का जनक भी कहा जाता है।

भारतीय समाज में योगदान

रॉय ने 1828 में कलकत्ता में ब्रह्मो समाज की स्थापना की, जो हिंदू धर्म के भीतर एक आस्तिक आंदोलन था। ब्रह्मो समाज वेदों की प्रामाणिकता को मान्यता नहीं देता, अवतारों में विश्वास नहीं करता, और कर्म या संसार में विश्वास पर जोर नहीं देता। संगठन ने इस्लाम और ईसाई धर्म से प्रभावित बहुदेववाद, छवि पूजा और जाति व्यवस्था की निंदा की।

सामाजिक सुधार

रॉय ने पारंपरिक हिंदू धर्म में मूर्तिपूजा और अंधविश्वास की अथक आलोचना की। उन्होंने जाति व्यवस्था की निंदा की और सती प्रथा पर हमला किया, जिसमें विधवाओं को उनके मृत पतियों की चिता पर जलाने की रस्म होती है। रॉय के लेखन ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया गवर्निंग काउंसिल को निर्णायक रूप से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसके परिणामस्वरूप 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया। रॉय ने 1823 में कलकत्ता प्रेस पर सेंसरशिप लगाने वाले ब्रिटिशों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित किया, जिसमें प्राकृतिक अधिकारों के रूप में भाषण और धर्म की स्वतंत्रता की वकालत की गई।

निष्कर्ष: Biography of Raja Ram Mohan Roy

राजा राममोहन राय भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और पुनर्जागरण के अग्रदूत थे। उनके द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज, सती प्रथा का उन्मूलन, बाल विवाह का विरोध, और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष ने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। उनकी शिक्षा और तर्क आधारित विचारधारा ने भारतीयों को आधुनिकता और प्रगति की ओर प्रेरित किया। उनकी विरासत आज भी भारतीय समाज में जीवित है, और उनके योगदान हमें यह सिखाते हैं कि तर्क, समानता, और मानवता के मूल्यों पर आधारित समाज ही सच्ची प्रगति की नींव हो सकता है।

Related Articles:-

Biography of Sarojini Naidu: एक कवयित्री, देशभक्त और नेता!
 
Biography of Atal Bihari Vajpayee: भारत रत्न अटल जी की पूरी जीवनी! Biography of Rabindranath Tagore: जानिए नोबेल विजेता की अद्भुत कहानी!
International Nurses Day-12 May: क्यों मनाते हैं नर्स डे? जानिए इतिहास और महत्व! A.P.J. Abdul Kalam Biography: प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और करियर!
Maharana Pratap Biography: एक वीर योद्धा का जीवन परिचय! World Asthma Day – May 6, 2025: थीम, महत्व और रोकथाम!
National Anti-Terrorism Day क्या है? जानें इतिहास, महत्व और उदेश्य! Biography of Aryabhatta: जानिए, आर्यभट्ट की जीवनी और अद्भुत खोजें!
World Laughter Day कब मनाया जाता है और इसका उद्देश्य क्या है? World Press Freedom Day: जानिए, प्रेस की आज़ादी का संघर्ष और इतिहास!
International Labour Day: जानें इतिहास, महत्व और अधिक जानकारी!
National Technology Day: जानें, भारत के लिए क्यों है ये दिन खास!

Share on:

Leave a Comment

Terms of Service | Disclaimer | Privacy Policy