Self Help Group (SHG) क्या होता है? जानिए गठन, लाभ, लोन और सरकारी सहायता की पूरी जानकारी!

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Self-Help Group से कैसे बदल रही हैं गांव की महिलाओं की जिंदगी? महिलाओं को मिलेगा लोन, रोजगार और आत्मनिर्भर बनने का मौका! | Self-Help Group (SHG)

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता लंबे समय से बड़ी चुनौतियाँ रही हैं। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब परिवारों को बैंकिंग सेवाओं, ऋण और रोजगार के अवसरों तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिल पाती थी। ऐसे समय में स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group – SHG) एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक आंदोलन के रूप में उभरे। स्वयं सहायता समूहों ने न केवल गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान की, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और समाज में उनकी स्थिति को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

स्वयं सहायता समूह ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों, विशेषकर महिलाओं, का एक छोटा स्वैच्छिक संगठन होता है। इसमें समान आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि वाले लगभग 10 से 20 लोग मिलकर एक समूह बनाते हैं। ये सदस्य नियमित रूप से छोटी-छोटी बचत जमा करते हैं और उस राशि से एक साझा कोष तैयार किया जाता है। इसी कोष से जरूरतमंद सदस्यों को कम ब्याज दर पर ऋण दिया जाता है ताकि वे अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें या छोटा व्यवसाय शुरू कर सकें।

this is the image of Self-Help Group online registration

एसएचजी केवल वित्तीय सहायता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और सामुदायिक विकास का भी एक सशक्त माध्यम बन चुके हैं। यह समूह स्व-शासित होते हैं और इनके सदस्य सामूहिक निर्णय लेकर अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं।

जून 2025 तक 10 करोड़ महिलाएं 91 लाख स्वयं सहायता समूहों का हिस्सा हैं । फरवरी 2023 तक , 89 लाख स्वयं सहायता समूहों ने 25 लाख करोड़ रुपये के ऋण का लाभ उठाया था , और 2023-24 (फरवरी 2024 तक) में 17 लाख करोड़ रुपये के ऋण वितरित किए गए थे।  

स्वयं सहायता समूह की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारत में ग्रामीण गरीबी का एक प्रमुख कारण वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुंच रहा है। गरीब परिवारों के पास बैंक से ऋण लेने के लिए आवश्यक संपार्श्विक सुरक्षा नहीं होती, जिसके कारण वे साहूकारों पर निर्भर हो जाते थे। साहूकार ऊँची ब्याज दर पर ऋण देते थे, जिससे गरीब और अधिक कर्ज में डूब जाते थे।

डॉ. सी. रंगराजन समिति ने वित्तीय समावेशन की कमी के चार प्रमुख कारण बताए थे:

  • संपार्श्विक सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थता
  • कमजोर ऋण शोधन क्षमता
  • संस्थानों की अपर्याप्त पहुंच
  • कमजोर सामुदायिक नेटवर्क

इन समस्याओं को देखते हुए स्वयं सहायता समूहों की आवश्यकता महसूस की गई। SHG मॉडल ने सामुदायिक सहयोग और आपसी विश्वास के आधार पर गरीबों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला और लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ।

स्वयं सहायता समूहों की उत्पत्ति और विकास

भारत में स्वयं सहायता समूह आंदोलन की शुरुआत 1972 में स्व-रोजगार महिला संघ (SEWA) की स्थापना से मानी जाती है। इसकी संस्थापक एला भट्ट थीं, जिन्होंने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली गरीब महिलाओं को संगठित करने का प्रयास किया। इन महिलाओं में बुनकर, कुम्हार, फेरीवाले और अन्य स्वरोजगार से जुड़े लोग शामिल थे।

हालांकि इससे पहले भी छोटे स्तर पर ऐसे प्रयास हुए थे। 1954 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन ने महिलाओं को सिलाई, बुनाई और अन्य कौशलों का प्रशिक्षण देने के लिए अपनी महिला शाखा शुरू की थी।

1992 में नाबार्ड ने स्वयं सहायता समूह बैंक लिंकेज परियोजना शुरू की, जिसे आज दुनिया की सबसे बड़ी माइक्रोफाइनेंस परियोजना माना जाता है। 1993 में भारतीय रिजर्व बैंक और नाबार्ड ने SHG को बैंक खाते खोलने की अनुमति दी। इसके बाद इन समूहों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने का मार्ग खुल गया।

1999 में भारत सरकार ने स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना शुरू की, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देना था। बाद में इसे 2011 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) में बदल दिया गया। आज NRLM के माध्यम से लाखों महिलाएं SHG से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

स्वयं सहायता समूह के मुख्य उद्देश्य

स्वयं सहायता समूहों का मुख्य उद्देश्य गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आत्मनिर्भर बनाना है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. बचत की आदत विकसित करना: SHG के सदस्य नियमित रूप से छोटी-छोटी राशि बचत के रूप में जमा करते हैं। इससे उनमें बचत और बैंकिंग की आदतें विकसित होती हैं।
  2. आसान ऋण सुविधा प्रदान करना: समूह के सदस्य आपसी सहमति से जरूरतमंद व्यक्ति को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराते हैं। इससे उन्हें साहूकारों के चंगुल से राहत मिलती है।
  3. महिला सशक्तिकरण: एसएचजी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे परिवार एवं समाज में निर्णय लेने में अधिक सक्षम बनते हैं।
  4. स्वरोजगार को बढ़ावा देना: SHG महिलाओं और गरीब परिवारों को छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
  5. सामाजिक जागरूकता बढ़ाना: ये समूह दहेज प्रथा, बाल विवाह, शराबखोरी और लैंगिक भेदभाव जैसी सामाजिक समस्याओं के खिलाफ जागरूकता फैलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वयं सहायता समूह कैसे काम करता है?

एक स्वयं सहायता समूह आमतौर पर 10 से 20 सदस्यों का होता है, जिनमें अधिकांश महिलाएं होती हैं। समूह के सदस्य नियमित रूप से साप्ताहिक या मासिक बैठकें करते हैं। हर सदस्य तय की गई राशि, जैसे ₹10, ₹20 या ₹50, बचत के रूप में जमा करता है।

यह जमा राशि समूह का साझा कोष बन जाती है। इस कोष से जरूरतमंद सदस्य को खेती, पशुपालन, सिलाई-कढ़ाई, किराना दुकान या अन्य छोटे व्यवसायों के लिए ऋण दिया जाता है। ऋण देने का निर्णय सामूहिक सहमति से लिया जाता है।

समूह के सभी लेन-देन का रिकॉर्ड रखा जाता है और नियमित बैठकों में हिसाब-किताब की समीक्षा की जाती है। इससे पारदर्शिता बनी रहती है और सदस्यों के बीच विश्वास मजबूत होता है।

SHG को मिलने वाले सरकारी लाभ

भारत सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को कई प्रकार की आर्थिक सहायता प्रदान करती है।

  • रिवॉल्विंग फंड: समूह के प्रारंभिक संचालन के लिए सरकार द्वारा लगभग ₹30,000 तक की सहायता राशि दी जाती है।
  • सामुदायिक निवेश फंड (CIF): व्यापार और आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए समूहों को ₹1.5 लाख तक का सामुदायिक निवेश फंड उपलब्ध कराया जाता है।
  • बैंक लिंकेज सुविधा: SHG को बैंकों से आसान किस्तों और कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इससे समूह बड़े स्तर पर व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।
  • सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता: SHG से जुड़ी महिलाओं को बीसी सखी, किसान सखी, पशु सखी और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में प्राथमिकता दी जाती है।

स्वयं सहायता समूह बनाने की प्रक्रिया

यदि कोई व्यक्ति स्वयं सहायता समूह बनाना चाहता है, तो उसे निम्नलिखित चरणों का पालन करना होता है:

  1. अपने गांव या क्षेत्र की 10 या उससे अधिक महिलाओं को एकत्रित करें।
  2. सभी सदस्यों की सहमति से समूह का नाम तय करें।
  3. समूह का बैंक खाता खुलवाएं।
  4. ग्राम पंचायत की समूह सखी या ब्लॉक कार्यालय में जाकर NRLM के तहत पंजीकरण कराएं।
  5. नियमित बैठकें और बचत प्रक्रिया शुरू करें।

पंजीकरण के बाद समूह को सरकारी योजनाओं और बैंकिंग सुविधाओं का लाभ मिलने लगता है।

स्वयं सहायता समूहों के विकास के चरण

प्रत्येक SHG आमतौर पर तीन प्रमुख चरणों से गुजरता है:

1. समूह का गठन

इस चरण में समान सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोग एक समूह बनाते हैं।

2. पूंजी निर्माण

सदस्य नियमित बचत करके समूह की पूंजी तैयार करते हैं।

3. कौशल विकास और आय सृजन

समूह के सदस्यों को व्यवसाय और स्वरोजगार से जुड़े कौशलों का प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे अपनी आय बढ़ा सकें।

SHG को बढ़ावा देने वाली संस्थाएं

स्वयं सहायता समूहों के गठन और संचालन में कई संस्थाएं सहयोग करती हैं:

इन संस्थाओं की मदद से SHG को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और विपणन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

स्वयं सहायता समूहों के प्रमुख कार्य

SHG समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने का कार्य करते हैं। इनके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

  • गरीबों को बिना गारंटी के ऋण उपलब्ध कराना
  • रोजगार और आय सृजन गतिविधियों को बढ़ावा देना
  • माइक्रोफाइनेंस सेवाएं प्रदान करना
  • बैंकिंग सेवाओं को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाना
  • बचत की आदत को बढ़ावा देना
  • सामूहिक नेतृत्व और चर्चा के माध्यम से विवादों का समाधान करना

स्वयं सहायता समूहों का महत्व

  1. सामाजिक समरसता: SHG समाज में सामाजिक एकता को बढ़ावा देते हैं। ये दहेज, शराबखोरी और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ सामूहिक प्रयास करते हैं।
  2. महिला सशक्तिकरण: महिलाएं SHG के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती हैं। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता विकसित होती है और वे ग्राम सभा तथा अन्य सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करने लगती हैं।
  3. वित्तीय समावेशन: SHG ने गरीबों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे लोगों की साहूकारों पर निर्भरता कम हुई है।
  4. रोजगार के अवसर: SHG महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करते हैं। सिलाई, डेयरी, पशुपालन, किराना दुकान और हस्तशिल्प जैसे छोटे व्यवसायों को बढ़ावा मिलता है।
  5. हाशिए पर रहने वाले वर्गों की आवाजSHG ने समाज के कमजोर वर्गों को अपनी बात रखने का मंच दिया है। इससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिला है।
  6. सरकारी योजनाओं की सफलता: SHG सरकारी योजनाओं को गांव स्तर तक पहुंचाने में मदद करते हैं। ये सामाजिक लेखा परीक्षा के माध्यम से भ्रष्टाचार को कम करने में भी सहायक हैं।

महिला सशक्तिकरण में SHG की भूमिका

  1. स्वयं सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं के लिए परिवर्तन का एक बड़ा माध्यम बने हैं। पहले महिलाएं केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, लेकिन अब वे आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी कर रही हैं।
  2. SHG के माध्यम से महिलाएं बैंक सखी, किसान सखी और पशु सखी के रूप में काम कर रही हैं। वे डिजिटल बैंकिंग, कृषि सलाह और पशुपालन सेवाओं में भी योगदान दे रही हैं।
  3. आर्थिक स्वतंत्रता मिलने से महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है। अब वे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में भागीदारी कर रही हैं। इससे पूरे परिवार और समाज का विकास हो रहा है।

स्वयं सहायता समूहों के लाभ

  • बैंकिंग साक्षरता में वृद्धि: SHG लोगों को बैंक खाते, बचत और ऋण की प्रक्रिया के बारे में जागरूक बनाते हैं।
  • स्वास्थ्य और पोषण में सुधार: आर्थिक स्थिति बेहतर होने से परिवारों को बेहतर भोजन, स्वास्थ्य सेवाएं और आवास सुविधाएं मिलती हैं। इससे मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी आई है।
  • कृषि पर निर्भरता में कमी: SHG गैर-कृषि गतिविधियों को बढ़ावा देकर लोगों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराते हैं।
  • दबाव समूह के रूप में भूमिका: SHG सामाजिक और स्थानीय समस्याओं को उठाकर सरकार पर कार्रवाई करने का दबाव बनाते हैं।
  • सामाजिक पूंजी का निर्माण: इन समूहों में लोगों के बीच विश्वास, सहयोग और सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित होती है।

स्वयं सहायता समूहों की समस्याएं

हालांकि SHG ने ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, फिर भी इनके सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं।

  • कौशल और तकनीकी ज्ञान की कमी: अधिकांश SHG आधुनिक तकनीकों और नए व्यावसायिक कौशलों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं।
  • कमजोर वित्तीय प्रबंधन: कई बार व्यवसाय से प्राप्त लाभ को सही तरीके से निवेश नहीं किया जाता और धन का उपयोग व्यक्तिगत कार्यों में हो जाता है।
  • अपर्याप्त प्रशिक्षण सुविधाएं: उत्पाद गुणवत्ता, विपणन, पैकेजिंग और प्रबंधन से जुड़े प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं हैं।
  • महिला समूहों में स्थिरता की कमी: कई महिलाएं विवाह या स्थान परिवर्तन के कारण समूह से अलग हो जाती हैं, जिससे समूह की स्थिरता प्रभावित होती है।
  • अपर्याप्त वित्तीय सहायता: कई समूहों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार पर्याप्त ऋण और अनुदान नहीं मिल पाते।
  • बैंकिंग सुविधाओं की कमी: देश के लाखों गांवों की तुलना में बैंक शाखाओं की संख्या अभी भी कम है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच सीमित रहती है।

SHG को प्रभावी बनाने के उपाय

स्वयं सहायता समूहों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सरकार और वित्तीय संस्थाओं को कई कदम उठाने की आवश्यकता है।

  • SHG आंदोलन को उन राज्यों तक विस्तारित करना जहां ऋण सुविधाएं कम हैं।
  • ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए नए रोजगार अवसर विकसित करना।
  • आईटी आधारित प्रशिक्षण और डिजिटल बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार करना।
  • प्रत्येक राज्य में SHG निगरानी प्रकोष्ठ स्थापित करना।
  • बैंकों और नाबार्ड द्वारा नए वित्तीय उत्पाद विकसित करना।
  • महिलाओं और गरीबों को संभावित उद्यमी के रूप में प्रोत्साहित करना।

भारत में सफल स्वयं सहायता समूहों के उदाहरण

1. केरल का कुडुम्बश्री मॉडल

कुडुम्बश्री परियोजना 1998 में केरल में शुरू की गई थी। यह भारत की सबसे बड़ी महिला सशक्तिकरण परियोजनाओं में से एक है। इसका मुख्य उद्देश्य गरीबी उन्मूलन, माइक्रोफाइनेंस और महिला उद्यमिता को बढ़ावा देना है।

2. महाराष्ट्र का MAVIM मॉडल

महाराष्ट्र में महिला आर्थिक विकास महामंडल (MAVIM) के तहत सामुदायिक प्रबंधित संसाधन केंद्र शुरू किए गए। ये केंद्र SHG को वित्तीय और आजीविका सेवाएं प्रदान करते हैं और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं।

स्वयं सहायता समूह पंजीकरण (SHG Registration) : पूरी प्रक्रिया, नियम, दस्तावेज और सरकारी लाभ!

स्वयं सहायता समूह (SHG) पंजीकरण क्या है?

स्वयं सहायता समूह (Self Help Group – SHG) ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर महिलाओं, का एक छोटा संगठन होता है जो बचत, ऋण और स्वरोजगार के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का कार्य करता है। भारत में SHG का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, लेकिन यदि समूह सरकारी योजनाओं, बैंक लोन, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता का लाभ लेना चाहता है, तो पंजीकरण कराना बेहद आवश्यक और फायदेमंद माना जाता है।

SHG को सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट या कोऑपरेटिव सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत कराया जा सकता है। हालांकि अधिकतर समूह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) या राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) के तहत रजिस्ट्रेशन कराना पसंद करते हैं क्योंकि इससे सरकारी फंड और योजनाओं का लाभ आसानी से मिल जाता है।

SHG पंजीकरण के लिए आवश्यक पात्रता और नियम!

स्वयं सहायता समूह बनाने और पंजीकरण कराने के लिए कुछ महत्वपूर्ण नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।

1. सदस्यों की संख्या

  • सामान्य क्षेत्रों में समूह में 10 से 20 सदस्य होने चाहिए।
  • पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में 5 से 20 सदस्य भी मान्य हैं।

2. एक परिवार से एक सदस्य

एक ही परिवार से केवल एक व्यक्ति समूह का सदस्य बन सकता है ताकि अधिक लोगों को लाभ मिल सके।

3. समान सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि

समूह के सभी सदस्य समान आर्थिक और सामाजिक स्थिति वाले होने चाहिए। इससे आपसी सहयोग और विश्वास मजबूत होते हैं।

4. महिला या पुरुष समूह

SHG या तो केवल महिलाओं का होगा या केवल पुरुषों का। हालांकि सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों को अधिक प्राथमिकता देती है।

SHG पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज

समूह का पंजीकरण और बैंक खाता खोलने के लिए निम्न दस्तावेज जरूरी होते हैं:

  • सभी सदस्यों के आधार कार्ड
  • पैन कार्ड PAN Card Apply
  • पासपोर्ट साइज फोटो
  • समूह का प्रस्ताव पत्र (Resolution Letter)
  • समूह की नियम पुस्तिका (By-laws)
  • अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष के दस्तावेज
  • समूह के नाम से खुला बैंक खाता

इन दस्तावेजों की सहायता से समूह को सरकारी पोर्टल पर पंजीकृत किया जाता है।

स्वयं सहायता समूह बनाने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया

1. पहली बैठक आयोजित करें

सबसे पहले सभी सदस्य एक बैठक करें और समूह गठन पर चर्चा करें।

बैठक में ये निर्णय लिए जाते हैं:

  • समूह का नाम
  • मासिक बचत राशि
  • बैठक की तारीख
  • ऋण पर ब्याज दर
  • समूह के नियम

उदाहरण: “लक्ष्मी महिला स्वयं सहायता समूह”

पदाधिकारियों का चयन

समूह को सही तरीके से चलाने के लिए तीन मुख्य पदाधिकारी चुने जाते हैं:

  • अध्यक्ष (President)
  • सचिव (Secretary)
  • कोषाध्यक्ष (Treasurer)

ये सदस्य समूह की बैठकों, बचत और बैंकिंग कार्यों को संभालते हैं।

प्रस्ताव पत्र (Resolution Letter) तैयार करें

एक रजिस्टर या मिनट बुक में समूह गठन का पूरा विवरण लिखा जाता है। इसमें सभी सदस्यों के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान लिए जाते हैं।

प्रस्ताव पत्र में यह भी लिखा जाता है:

  • बैंक खाता खोलने की अनुमति
  • पदाधिकारियों के नाम
  • समूह के नियम

यह दस्तावेज बैंक और सरकारी कार्यालय दोनों जगह आवश्यक होता है।

SHG बैंक खाता कैसे खोलें?

समूह के नाम से बचत खाता (Saving Account) खोलना बेहद जरूरी है।

बैंक खाता खोलने के लिए आवश्यक दस्तावेज:

  • प्रस्ताव पत्र
  • समूह की नियम पुस्तिका
  • अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष के आधार और पैन कार्ड
  • पासपोर्ट फोटो
  • समूह की रबर मोहर (Stamp)

ग्रामीण बैंक या राष्ट्रीयकृत बैंक में खाता खुलवाना अधिक लाभदायक माना जाता है।

NRLM पोर्टल पर पंजीकरण

ग्रामीण क्षेत्र के लिए

ग्रामीण क्षेत्रों में SHG का पंजीकरण ब्लॉक कार्यालय के माध्यम से किया जाता है।

इसके लिए:

  • ब्लॉक मिशन मैनेजर (BMM)
  • या आजीविका सखी

से संपर्क करना होता है।

वे आपके समूह का डेटा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज करते हैं।

शहरी क्षेत्र के लिए पंजीकरण

यदि समूह शहरी क्षेत्र में है, तो नगर निगम या नगर पालिका कार्यालय में जाकर DAY-NULM योजना के तहत पंजीकरण कराया जाता है।

यह प्रक्रिया कम्युनिटी ऑर्गेनाइजर (CO) द्वारा पूरी की जाती है।

SHG को मिलने वाली Unique SHG ID क्या होती है?

सरकारी पोर्टल पर सफल पंजीकरण के बाद समूह को एक Unique SHG ID दी जाती है।

यह आईडी बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि:

  • इसी के आधार पर सरकारी फंड मिलता है
  • बैंक लोन स्वीकृत होता है SHG Bank Loan Official website
  • सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है
  • समूह की पहचान बनती है

SHG पंजीकरण के प्रमुख लाभ

1. रिवॉल्विंग फंड (Revolving Fund)

सरकार द्वारा समूह को ₹15,000 से ₹40,000 तक की वित्तीय सहायता दी जाती है ताकि समूह अपने कार्य शुरू कर सके।

2. कम ब्याज पर बैंक लोन

SHG को बिना गारंटी के बैंक लोन उपलब्ध कराया जाता है। इस राशि का उपयोग महिलाएं:

  • डेयरी
  • सिलाई
  • बुनाई
  • पशुपालन
  • किराना दुकान
  • छोटे व्यवसाय

शुरू करने के लिए कर सकती हैं।

3. मुफ्त कौशल विकास प्रशिक्षण

समूह के सदस्यों को विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जाता है, जैसे:

  • सिलाई
  • ब्यूटी पार्लर
  • डेयरी
  • खाद्य प्रसंस्करण
  • हस्तशिल्प
  • कंप्यूटर प्रशिक्षण

इससे महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिलते हैं।

आजीविका सखी और ब्लॉक मिशन मैनेजर की भूमिका

यदि किसी महिला को SHG पंजीकरण में परेशानी आती है, तो वह:

  • ब्लॉक कार्यालय
  • आजीविका सखी
  • ब्लॉक मिशन मैनेजर (BMM)

से मुफ्त सहायता प्राप्त कर सकती है।

ये अधिकारी:

  • दस्तावेज जांचते हैं
  • पोर्टल पर डेटा अपलोड करते हैं
  • बैंकिंग सहायता दिलाते हैं
  • सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं

SHG पंजीकरण प्रक्रिया पूरी तरह मुफ्त है

सरकार द्वारा NRLM और DAY-NULM के तहत SHG पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी तरह निःशुल्क रखी गई है।

यदि कोई व्यक्ति पंजीकरण के नाम पर पैसे मांगता है, तो उसकी शिकायत संबंधित ब्लॉक कार्यालय में की जा सकती है।

SHG पंजीकरण क्यों जरूरी है?

हालांकि SHG बिना पंजीकरण के भी चल सकता है, लेकिन सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण कराने से कई बड़े लाभ मिलते हैं:

  • सरकारी फंड
  • बैंक लोन
  • प्रशिक्षण
  • सब्सिडी
  • स्वरोजगार सहायता
  • महिला सशक्तिकरण योजनाएं

इसी कारण आज लाखों महिलाएं SHG से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं।

निष्कर्ष: Self-Help Group (SHG)

स्वयं सहायता समूह भारत में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम बन चुके हैं। इन्होंने गरीबों, विशेषकर महिलाओं, को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। SHG ने ग्रामीण क्षेत्रों में बचत, बैंकिंग और स्वरोजगार की संस्कृति को मजबूत किया है। इसके माध्यम से लाखों महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान मिली है।

हालांकि अभी भी कौशल विकास, वित्तीय प्रबंधन और बैंकिंग पहुंच जैसी चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन सही नीतियों और प्रशिक्षण के माध्यम से इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। यदि SHG आंदोलन को और अधिक मजबूत बनाया जाए, तो यह भारत में गरीबी उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण और समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

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